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नोव्हेंबर, २०२२ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे

दीनके दयाल दाता

दीनके दयाल दाता !  मेरे दु:ख सारना || टेक || भौंर भौंर फेरा खाया ,  मानुजकी देह पाया कर्म - बंध मेंहि फंसाया ,  फेर मोरि वारना ॥ १ ॥  बालपना खेलत खोया ,  याद प्रभूकी ना कीया ।  तारुण जवानी पाया ,  पापि काम जारना ॥ ॥ २ ॥  तिरियाँ के संग भूला ,  दुर्जनों के साथ डूला ।  पापियों के पास झूला ,  भूल यह सुधारना ॥ ३ ॥  तीर्थ नेम कुछ ना कीन्हा ,  ताप जापभी ना चीन्हा ।  ऐसियोंको नाथबिना ,  कौन करे तारना || ४ || तेरोही अधार साँई !  दूज हमें कौन उपाई ? तुकड्या सहारा तूही ,  भूलको बिसारना ? ॥ ५ ॥ 

आसरा धरा हूँ तिसका

आसरा धरा हूँ तिसका ,  जिमें विश्व आता है || टेक || मूल गणेशा को दीन्हा ,  स्वाधिष्ठान ब्रह्मा लीन्हा ।  मणीपूर विष्णू ठाना ,  जिसहिमें समाता है ॥ १ ॥  रुद्र अनाहतमे बैठा ,  बिशुद्धि मे जान है लेटा ।  द्विदलपे मायाका खेटा ,  बैठके रमाता है ॥ २ ॥  कोट भानु बिजली चमके ,  वही खास सांई हमके ।  कहे दास तुकड्या रमके ,  फकीरी कमाता है ॥ ३ ॥ 

खैचको निहारो मुझको

खैचको निहारो मुझको ,  नाय ! मैं फँसाया हूँ || टेक || तनरुपि यह नौका मेरी ,  नागनिने आके घेरी ।  नागती बडी है जहरी ,  जहरसे कसाया हूँ ॥ १ ॥  जबहि वह फुत्कारा डारे ,  भक्तिरूप फुलको जारे ।  विकारी उन्हें कर डारे ,  आसजल धँसाया हूँ ॥ २ ॥  तनरुपि यह नौका मेरी ,  भोगमें फँसाई सारी ।  शरण आ पडा हूँ तेरी ,  नागसे लसाया हूँ ॥ ३ ॥ जहरसे निकारो साँई !  अब न सहन होता भाई ।  तुकड्या चरणको पाई ,  क्यों न फिर हँसाया हूँ ? ॥ ४ ॥ 

क्या कहूँ न कहना है सो

क्या कहूँ न कहना है सो ,  याद सभी साँई को || टेक || तात कहे ' कपूत बेटा ,  टाल कूटनेको बैठा ' । ,  माँ कहे ' नसीबा फूटा ,  निकलता फिराईको ' ॥ १ ॥  मित्रभी ' दिवाना ' बोले ,  ग्राम में लगाते ठोले ।  कोउ नहीं- अच्छा तोले ,  कदर है न भाईको ॥ २ ॥  गोत घर न आने देवे ,  पासकामी छीना लेवे ।  साथिदार दुरसे भीवे ,  करे घर मनाईको ॥ ३ ॥  साँई ! तुम बिना अब कोई ,  है न सभी घुमके आई  तुकड्याको सहारा तूही ,  ताकता सहाईको ॥ ४ ॥ 

क्यों न पार पावेगा

क्यों न पार पावेगा ,  जो नाथकी सहाई हो ? ॥ टेक ॥  शिला अहिल्या उद्धारे ,  कोलिको ऋषी कर डारे ।  असुरण विभीषण को तारे ,  भक्त जो कहाई हो ॥ १ ॥ धृवको सहारा दीन्हा ,  नाम जो उसीका लीन्हा ।  द्रौपदिको लाज चीन्हा ,  चोरसे नहाई हो ॥ २ ॥  गजने नाम उसका पाई ,  जलमे डुबा खीचे साँई उसीका जो होवे भाई !  सो नहीं बहाई हो || ३ || आजतक न ऐसा कोई ,  नाम लेके भूला होई ।  तुकड्या गुणोंको गाई ,  लीनसे रहाई हो ॥ ४ ॥ 

बार बार अरजी मेरी

बार बार अरजी मेरी ,  नाथजीसे करता हूँ ॥टेक ॥  काम क्रोध मारे मारा ,  लोभ मोह तनमें सारा ।  मदोंकी गिराते धारा ,  फेर फेर मरता हूँ ॥ १ ॥  विषय पाँच आके घरे ,  जवाई बने है मेरे ।  धनोंको लुटाया सारे ,  इन्हींसे में डरता हूँ ॥ २ ॥  वृत्तियाँ भुलादी सारी ,  भोग में फंसाके मारी ।  फेर ऊठ होवे जारी ,  उसके साथ परता हूँ ॥ ३ ॥  सभीने डुबाया साँई !  अभी याद तुम्हरी आई ।  ताके बिना कौन छुड़ाई !  चरण सीस धरता हूँ ॥ ४ ॥  दीनके दयालु आपी ,  सहारा तुम्हारा काफी ।  तराओ यह तुकड्या पापी ,  नाम लेके तरता हूँ ॥५ ॥

जिंदगी जो मेरी थी सो

जिंदगी जो मेरी थी सो ,  मैहिको दिलायदो || टेक ||  जोड़ जोड़ गठड़ा लाया ,  मानुजकी देह पाया ।  जिसीके लिये मै आया ,  वहीको पिलायदो || १ || दीन दास दरपे रोता ,  न्याय क्यों न मेरा होता ?  जिसके लिये खाऊ गोता ,  उसीको मिलायदो ॥ २ ॥  शक मेरा डाकूपे होता ,  इन्होंने दिलाया गोता ।  करके चला हूँ में भोता ,  इन्होंको जलायदो ॥ ३ ॥  पाँच छैप मिलके आये ,  घरमें मेरे डाका लाये ।  मुझे धूंधमें मिलवाये ,  इन्हींको भूलायदो ॥ ४ ॥  नार एक ठगनी आई ,  मुझे नींद दी चढवाई ।  चोरने धनुको उडवाई ,  तुकडया जिलायदो ॥ ५ ॥

क्या कहे न जात

क्या कहे न जात ,  प्रीतका परेचा  जाने जो रामनाम सोही जगा साचा॥ टेक ॥  मुखहूँते कौन काम ,  गर मनमों ना विराम ?  जान्यो नहि परम धाम ,  जानू ऊंच - नीचा ॥ १ ॥  इतहूँते गात राम ,  अन्तरमों बढत काम ।  क्या जानूं कर गुलाम ,  बाँधे जम खींचा ॥ २ ॥  सो जाने प्रीत एक ,  दूजे कहते अनेक ।  तो क्या दिल जौं न पाक ,  राखे मन नीचा ॥ ३ ॥  जिसने भ्रम भेद धोय ,  नाम जपा रोय - रोय ।  छाँडी तन - लाज खोय ,  सोहि तरा साचा ॥ ४ ॥  तुकडया कहे क्या कहिये ,  कहनेसे रँग रहिये ।  प्रीतममों जा बहिये ,  जान न जात त वाचा ॥ ५ ॥ 

कहो गुरु ! संदेश आज

कहो गुरु ! संदेश आज ,  पग कहाँसु आये ? ।  कितने दिन है मुकाम ,  काज क्या उठाये ? || टेक || कहाँ धरि है दंड माल ,  पूजा अरु शंख शाल ।  तन लंगोट भबूत भाल ,  क्यों जटा रमाये ? ॥ १ ॥  चिमटा अरु पग खडाव ,  ध्यान ज्ञान ज्ञेय दाँव ।  क्या साधे हो उपाव ,  क्या दवाइ खाये ? ॥ २ ॥  यह झोली कवन दिन्ही ,  कितने दिन संग लिन्ही ?  तुकड्याकी लाज छिनी ,  रूप क्या समाये ? ॥ ३ ॥ 

क्या कहूँ कृपालनाथ

क्या कहूँ कृपालनाथ !  कर्मकी बिमारी भूला यह जीव ,  याद तोर ही बिसारी ॥ टेक ॥  आठों जाम ढूंढ भौंर ,  पलमी नहि धरत धीर ।  रामनामको बधीर ,  लाज छोड़ि सारी ।। १ ।।  झूठोंपर करत प्रेम ,  छोडे सब नीति - नेम ।  सुखको कहे हाम हाम ,  भूलके मुरारी ॥ २ ॥  संत - संग कहि न पात ,  भटके वह काम साथ |  भूल्यो सब जात पात ,  मर्कट चित धारी ॥ ३ ॥  कौन गती होइ मोर ,  कब छूटे यह अघोर ? ।  अंतकाल चोर पोर ,  लूटे बनवारी ! || ४ || कहता सब हाल हाल ,  तुम्हरे पगमों दयाल तुकडयाकी झूठ माल ,  तोडके निकारी ॥ ५ ॥ 

आज श्याम जीत लियो

आज श्याम जीत लियो ,  कुंजवन - बिहारी ।  खेला भक्तन के साथ ,  लाज छोड सारी ॥टेक ||  बीनाकी कर कट्यार नैननके बीच डार ।  शब्द-बाण छोडछोड नैनको उछारी ॥ १ ॥  भावका गुलाल फेक ,  डारा पद देखदेख मोहित कर प्रेम - फॉस ,  अंगपे निछारी ॥ २ ॥  ज्ञानका लगाय डोर ,  तन मनसे कीन्ह जोर ।  कहे तुकडया था न और ,  रंगसे निहारी ॥ ३ ॥  

आज देखो नंदलाल

आज देखो नंदलाल ,  सांवरो बिहारी ।  मोरमुकुट चमकत है ,  कुंडल- छबि न्यारी ॥ टेक ॥  जमुनाके आसपास ,  गौएँ निशिदिन चरात ।  खेले नित ग्वाल साथ ,  मोहे मन - हारी ॥ १ ॥  रंग - रंगके फुलार ,  पहिनाये देखो हार |  तिरछी कर नैन कटी  पीतांबर - धारी ॥ २ ॥  नाचत कई गोवि गोप ,  लोला चाहे अमूप ।  बंसरिकी टेर सुनत ,  गुंग होत सारी ॥ ३ ॥ कइ नरेश और ईश ,  ब्रह्मा नारद महेश |  देखत ही चकित होत ,  अंत ना निहारी ॥ ४ ॥  जो सबका सकलधाम ,  खेलनको करत काम ।  कहे तुकड्या स्मरत नाम ,  दुःखको निवारी ॥ ५ ॥ 

जाग जाग जाग सखी

जाग जाग जाग सखी !  चेत गई होरी ।  कर सिंगार खेलत है ,  लाखों नर नारी ॥ टेक ॥  नंदके आनंदकंद ,  धर लीन्हो यहहि छंद ।  प्रेमके गुलाल बीच ,  छोडे पिचकारी ॥ १ ॥  संग लेत ग्वाल - बाल ,  मोरमुकुट पहिर शाल ।  टिपरीको जोर चली ,  नाचत सुख - ठौंरी ॥ २ ॥  मंत्रकी अहूत देत ,  सोहँ ' निज करत हेत ।  भक्तनके सँग अचेत ,  खेले गिरिधारी ॥ ३ ॥  बाजे अनहद घडयाल ,  टिपरि अरु मृदंग - लाल ।  तुकड्यापर देत ख्याल ,  वक्त क्यों बिसारी ? ॥ ४ ॥ 

हो हुशार , हो हुशार

हो हुशार , हो हुशार ,  कठिण वक्त पाई ।  चेता सबही मकान ,  रीत जगह नाही || टेक || इतहूँते काम - काल ,  उतहूँ आज्ञा विशाल ।  लूट्यो कैसे अमूप ,  कुछ स्वतंत्र नाही ॥ २ ॥  क्यों सोया हो हुशार ,  नाहक बनकर गँवार |  निकल गयी राज - पाट ,  लटक्यो बिव आई ।। ३ ।।  तुकड्या कहे राख याद ,  तोर भयो नूर बाद ।  ऊठ ऊठ हो अजाद ,  जीत भव - तराई ॥ ४ ॥

राम सुमिर , राम सुमिर

राम सुमिर , राम सुमिर ,  राम सुमिर भाई !  सुमरणविन इस जयमों ,  कोउ ना सहाई || टेक |  छोड द्रोह मोह लोभ ,  रामको रिझाई ।  ना भूलो आठों जाम ,  रंग जा घटमाँही ॥ १ ॥  प्रीती मुखसे उचार ,  मनसे कुमतिको मार  छोडे भ्रम - अंधकार ,  निर्भय हो भाई ! ॥ २ ॥  सबमें समभाव राख ,  वृत्तिहिको करत पाक अंतरंग जोड हाँक ,  दु:खको हटाई ॥ ३ ॥ इसविध तू सुमिर राम ,  पूरण पावे अराम छूटे सब झूट काम ,  ब्रह्म - भेद पाई || ४ || तुकड्या तिनको गुलाम ,  जो नित यह रटत नाम ।  नाम लेत पा अराम ,  छूटे जम - हाई || ५ ||

गुरुदयाल गुरुदयाल

गुरुदयाल गुरुदयाल '  सुमिर जाग भाई !   बीती सब रैन फर ,  अब उजार आई || टेक || जपत रहो सिद्ध नाम ,  पाओगे फिर अराम ।  अंतःकाल मिलत राम ,  जन्म मरण नाही ॥ १ ॥  काहे यह योगयाग ,  कठिन कठिन कठिन भाग ।  लीन रहो जपत नाम ,  जन्मको कटाई ॥ २ ॥  काहे सिर जोग लेत ,  ना इससे काल मेत ।  सहज सहज - प्रेम धरो ,  प्रेम - झरा पाई ॥३ ॥  मोरे मन यहहि हेत ,  राम - दरस धीर देत ।  तुकड्या तुकडेको खात ,  काल यह निभाई ॥ ४ ॥ 

जाग जाग जाग मूढ़

जाग जाग जाग मूढ़ !  छोड़ दे अँधेरा ।  मलिन बुद्धि - नींद त्यजो ,  शुद्ध ले उजारा ॥ टेक ॥  नर - तन अनमोल पाय ,  विषयसंग क्यों गमाय ?  अंतःकाल बिपत पडी ,  कहि न मिले थारा ॥ १ ॥  जागा प्रल्हाद बाल ,  ' नारायण जपत माल ।  जन्म - मरण टूट पडे नामसे उबारा ॥ २ ॥  जगनेसे धूव तरा ,  आसन धृव ' ध्रुव करा त्याग दिन्हो राज - काज ,  रहत अलख न्यारा ॥ ३ ॥  अलख ब्रह्म - ज्योत जगी ,  जागे जो उनहुँ लगी ।  तुकड्या पद ' पद ' हि पात ,  नींदको बिसारा ॥ ४ ॥ 

जाग रे अजान मूढ

जाग रे अजान मूढ !  छोड़ दे अँधेरा ।  पलक खोल ' राम बोल ,  देखले उजारा ॥ टेक ||  बन बन क्यों बिचर पड़ा ,  विषयनमें काहे जड़ा ?  दिन दिन पल जात उड़ा ,  हंस यह पियारा ॥ १ ॥  कर सिंगार कारबार ,  गोत मीत सूत नार |  आखिर में खाय हार ,  जन्म जाय मारा ॥ २ ॥  ऊठ संत - संग साध ,  छोड़ जगत - फंद वाद ।  महिमा उनकी अगाध ,  पाय मोक्ष - धारा ॥ ३ ॥  सोत सोत रैन गई ,  बिजलीसम चमक भई ।  तुकड्याने कीन्ह सही ,  ' राम है हमारा ' ॥ ४ ॥ 

जाग रे कुमार बाल

जाग रे कुमार बाल !  घोर काल आया ।  कहाँतक अब सोत पडे ,  वक्त क्यों गमाया ? ॥टेक ॥  घडि घडि पल रेन जात ,  मेघ-गर्जना सुहात माया - अंधियार बीच  प्रेम क्यों लगाया ? ॥ १ ॥  योरी अब बाकि रही ,  दिनकी यह  भोर भई ।  अन्तकाल आन पडे जायगा धकाया ॥ २ ॥  अँधियारा दूर डार ,  पलट देखले उजार ।  नहि तो फिर भूल गया ,  काल आय खाया ॥ ३ ॥  करनी कर चेतनकी छोड दे अचेतनकी खबर मान तुकड्याकी ,  याद क्यों मुलाया ? ॥ ४ ॥ 

मोरे मना ! जाग जरा होगयो सबेरो

मोरे मना ! जाग जरा होगयो सबेरो  बिजलीसम चमक भई ,  चिडियाँ चित चेरो ॥ टेक ॥  मुरगा चित बाँग देत ,  हंस जप विवेक लेत  अंतःकरण मधुर गात , '  सोहँ पद घेरो ॥ १ ॥  नाहक क्यों सोत पडा ,  मलिन काम- काल खड़ा ।  ऊठ ऊठ मार उसे  घर डुबाय तेरो ॥ २ ॥ ठगनी यह नींद जहाँ  फोल फोल काम तहाँ बिगडावत नेमनको  करत और देरो || ३ || सुध बिचार आँख खोल  मुखसे प्रभुनाम बोल तुकड्याका सुनत ढोल  कर्णको उधेरो ||४ ||

भज नर ! गुरुको सुजान

भज नर ! गुरुको सुजान ,  कटत जन्म - फेर मान ।  घूमत क्यों रान रान ?  सुध ले गुण गा रे ॥ टेक ॥  शास्त्र बाच बाच करे ,  फिर जीवित जाय मरे ।  गुरु के बिन कौन तरे ,  चरण धर पियारे ! ॥ १ ॥  संतनका संग किना ,  जन्म जन्म जोड लिना ।  जन्म - मरण दूर छिना ,  भव - नौका तारे ॥ २ ॥  नाम लेत प्रकट हुआ ,  गुरु महिमा अंत कहां ?  तुकड्या गुण गाय रहा ,  चरणमें मिला रे ॥ ३ ॥ 

जय श्रीगुरु दत्तराज

जय श्रीगुरु दत्तराज !  सफल करे दास-काज दिगंबर धरत साज ,  दीनन - दुख टारे || टेक || औदुंबर वास करत ,  सुर नर मुनि ध्यान धरत ।  नाम लेत विघ्न हरत ,  अत्रिके दुलारे ! ॥ १ ॥  सीस जटा तीन सीर ,  वास जान्हविके तीर ।  श्वान - संग धरत धीर ,  नट - स्वरूप धारे ! ॥२ ॥  भस्म - लेप सर्प अंग ,  रुद्र माल धरत संग ।  डमरू कर त्रिशुल दंग ,  तुकड्या - दुख वारे ॥ ३ ॥ 

जय जय जगदंब मात

जय जय जगदंब मात !  शरणागत दिन अनाथ  भक्तनको त्वरित पात ,  महिषासुर मारी ! || टेक || अष्टभुजा खड्ग धरत ,  सिंहपे सवारि करत |  ब्रह्मादिक पूज तरत ,  ध्यावत नरनारी || १ || मूल तू जगत् - जननी ,  दैत्य राजकी मथनी  तेजोरुपकी नटनी ,  बेदकी अधारी || २ ||  विष्णु रुद्र ब्रह्म बाल ,  निजपाये जगत - पाल ।  करत सूर - असुर पाल ,  तुकड्या - दुखवारी ! ॥ ३ ॥ 

रे भज नरसिंहरूप

रे भज नरसिंहरूप ,  द्वैतनको करत चूप ध्याते तिनका स्वरूप ,  मुफ्त होय प्यारे ! || टेक || धरके नरका अकार ,  सिर सिंहनको अधार बिजली- सम चमकदार ,  स्तंभमें गुरारे || १ || खंब फोडकर विशाल ,  तेजदार नैन भाल ।  प्रगट होत भक्तपाल ,  दैत्य मार डारे || २ || तारा प्रल्हाद बाल ,  नारायण जपत माल ।  नाम स्मरत दूर काल ,  तुकडया - दुख वारे ।। ३॥ 

भज भज नर ! ' राम राम

भज भज नर ! ' राम राम ' ,  मंगल सुख देत नाम ।  भक्तनके सिद्ध धाम ,  सकल भय निवारे | टेक |  रत्न मुकुट तिलक भाल ,  मोतनकी लसत माल ।  ऋषि - गणका करत पाल ,  नाम लेत तारे ॥ १ ॥  करमे धर चाप बाण ,  शंकर नित धरत ध्यान |  अर्धांगी शक्ति मात ,  सीता बिलसा रे || २ || सीस ' भरत ' छत्र धरे ,  लछमन निज चमर करे ।  मारुति नित चरण परे ,  तुकड्या - दुख वारे || ३ ||

शंकर ' मुख स्मरत नाम

" शंकर ' मुख स्मरत नाम ,  सफल होत सकल काम ।  देत भक्तको अराम ,  मंगल सुखकारी ॥टेक ॥  तीन नयन चंद्र भाल ,  शोभत गत मुंडमाल भजते दुर होत काल ,  दासको उधारी || १ || जहर भंग पीत जात ,  रामनाम नित्य गात नाग कंठ में बसात ,  देखे भय-हारी || २ || नंदीपर हो सवार ,  डमरू त्रिशुल सँवार ।  मृगछाला भबूत धार ,  भय - दुखवारी ॥ २ ॥ 

शरणागत निर्विकार

शरणागत निर्विकार !  भव - भय यह दूर वार ।  जन्म - मरण - पाश हार ,  नंदके दुलारे ! || टेक || मोरमुकुट सीस जड़ा ,  कुंडल निज कान लड़ा ।  जमुना तट होत खड़ा ,  भक्तके पियारे ! ॥ १ ॥  पीतांबर कसत कटी ,  मुरली धर अधर सटी ।  वृंदावन कुंज - वटी ,  सुंदर गित गा रे ! ॥ २ ॥  कमलनयन नट - स्वरूप ,  राजनके राजभूप तुकड्या बर दे अमूप ,  नामको जिया रे ! ॥३ ॥  

धन्य यह तेरो स्वामि ! निशान

धन्य यह तेरो स्वामि ! निशान |  भजत सब कट जावे अज्ञान | टेक | कई पापोंका नाश कराकर ,  कियो है निर्मल जान ।  संशय - फाँसा तोडतोडकर ,  कीन्हो ब्रम्ह - पछान ॥  बाहर ढूंढत नजर न आवे  पीवे अमृत - पान |  पलमें स्नान करे संगमपर ,  दर्शन ब्रम्ह - निधान ॥  किरपा करके यहि दीजो बर ,  ' किजिये आप समान ' ।  तुकड्याबालक चरण पधारे ,  यही धर्म अरु दान || ३ ||

सफल कर काज सरस्वति मात

सफल कर काज सरस्वति मात !  नमन करता हूँ दीन अनाथ || टेक ||  प्रथम तूहि जगतारक जननी ,  मूल परा निज - गात ।  प्रगट हुई बिजलोसम तनमे ,  जगमग रूप दिखात ॥ १ ॥ पंच तत्त्वका बीणा लेकर ,  अंदर सूर लगात ।  ओहं सोहं करती गायन ,  मधूर नाद दिखात ॥ २ ॥  जगदीश्वरि ! हो हंस - सवारा ,  ब्रह्मरंध्रतक जात ।  इडा- पिंगला रूप धराकर ,  हरदम दर्शन पात || ३ || सूरज चंद्र रूपमें तेरे ,  आपहि लिन हो जात ।  तुकड्याबाल चरणको चीन्हे ,  दास हुआ दिनरात ॥ ४ ॥ 

नमो दुर्गे ! निज दास उधार

नमो दुर्गे ! निज दास उधार ।  करो भव - नैया मेरी पार ॥टेक ॥  मूल अधार तूहि जग - जननी ,  करे भुवर - परिवार ।  ब्रह्मा रुद्र विष्णु निपजावे ,  जग- तारक करतार ॥ एक रूप दिल स्वरूप धराये ,  त्रेगुण होकर नार ।  अष्टभुजा वहिसे प्रगटाई ,  होवत सिंह - सवार ॥ २ ॥  आदिशक्ति परब्रम्हरुपी ,  तन धरियो मात ! उबार ।  तुकड्यादास शरण तोहि आयो ,  चरणन आस पधार ॥ ३ ॥