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भजन कुंज लेबलसह पोस्ट दाखवत आहे

मेरा मन है गन्दा

  ( तर्ज मेरे मनकी गंगा )  मेरा मन है गन्दा ,  करके हूँ शरमिन्दा मैं ।  बोल भगवन् बोल ,  दर्शन होगा की नहीं ॥ टेक ॥  जब - जब मैंने नाम लिया है ।  साथ दिया नहीं है मन नें ।  लोग नहीं तरसाये करके ।  जाकर बैठा था बन में ।  फिर भी नहीं मन माना ,  करके हुआ दिवाना मैं । बोल ॥१ ॥  किसने बोला प्राण चढाओ ।  योग किया पद्मासन से ।  नेती धोती बस्ती साधा ।  ध्यान किया था साधन से ।  काबूमें नहीं आया ,  कितने तीरथ न्हाया मैं । बोल ॥ २ ॥ आँखोंसे बहता है पानी ।  दिल धडके अनजानी है ।  तुकडयादास कहे , गुरु - किरपा ।  पार करे यह ठानी है ।  बेडा होगा पार ,  लीया चरणों का आधार मैं । बोल ॥३ ॥  

प्रेम भजन रघुवरको

 ( राग- आसावरी , ताल : दादरा )  प्रेम भजन रघुवरको ,  कान सुनत जाग गयो ।  रंग लागो हृदयनसो ,  तन - मनको मान गयो ॥ टेक ॥  बीना की तार चढी ,  स्वासा की बोल बढी ।  नस - नस सब डोल गयी ,  जान भक्ति मान गयो ॥ १ ॥ नैननसो नीर बहा ,  कण्ठ रूप स्थीर हुआ ।  सात्विक गंभीर वृत्ति ,  धुन समाधी लाग गयो ॥२ ॥  नाच गये जन - गण ये ,  वृक्षलता मधुबन ये ।  तुकडयाको अपनाकर ,  शरयू तट दर्श दियो ॥३ ॥ 

राम - भजन बिन को सुख पाया

 ( तर्ज - चाहूँगा मैं तुझे सांज सबेरे . )  राम - भजन बिन को सुख पाया ?  मैंने सुना नहीं , कौन बताया ??  फिर क्यों वहाँ रहूँगा ? ॥ टेक ॥  जीवन ये दुखमय है , आज रहे ,  काल गये ।  सोच जरा , सत्य कहा , कौन सार ।  फिर क्यों ॥१ ॥  राज गये , साज गये , जोगी गये ,  कुछ ना रहे ।  काल खडा , लेने अडा , होजा पार ।  फिर क्यों ॥२ ॥  एक सही राम ही है ,  दुनियाँ में नाम ही है ।  राम कहो , नाम कहो , वो ही अधार ।  फिर क्यों ॥३ ॥  तुकडयाने नाम लिया ,  सत्गुरुने बरद दिया ।  जीवन में सार मिला , तार पार ।  फिर क्यों ॥४ ॥

मेरा शत्रू मेरा मन

 ( तर्ज मेरी दोस्ती मेरा प्यार . )  मेरा शत्रू मेरा मन , मेरा शत्रू मेरा मन ।  मन ढूंढे बन - बन , बसे नहीं क्षण ,  चाहे करलूं जतन ॥ टेक ॥  पूरा एक करे नहीं काम ,  इसीसे मैं बड़ा बदनाम ।  हरदम चाहे - मिले आराम ।  माँगे मुफतका धन , सिखे नहीं गुण ,  चाहे करलूं जतन ॥१ ॥  बदलता है घडीमें रंग ,  जो मिलता उसीके संग ।  उसको अपना नहीं है ढंग  मोटी बात सुनाये , करन नहीं पाये ,  चाहे करलूं जतन ॥२ ॥  मन जीते तो जग जीतूं ,  मन बिगडे तो है मृत्यु ।  मनके हारे सभी छी : तू ।  दिलसे तुकडया बोले ,  ये मन अपनाले ,  चाहे करलूं जतन ॥३ ॥

खाली हाथोंसे जाना नहीं है

 ( तर्ज - ये देखो जला घर किसीका . )  खाली हाथोंसे जाना नहीं है ।  जावो तो लाभ पाना नहीं है ।  राजा - गुरु - ज्योतिषी - वैद्य ये  इनको देनेसे ही यश सही है ॥ टेक ॥  फल - फूल दो दिल - खुशीसे ।  फिर जावो मिलने उन्हीं से ।  बोलो वही बात , झूठी नहीं  समझो , आशा पूरी हो गयी है ॥१ ॥ शक्कर जो दे प्रेम लाये ।  सेवा करे नाम पाये ।  हो भावना , साँचकी याचना  तब तो सब कामना पा गयी है ॥२ ॥  उनका कहा मानना है ।  हटना नहीं प्राण जाये ।  तुकडया कहे याद पूरी रहे  फेर दुःखका ठिकाना नहीं है ॥३ ॥ 

सत् छोडे पथ जाय

 ( तर्ज मेरी दोस्ती मेरा प्यार . )  सत् छोडे पथ जाय ,  सत् छोडे पथ जाय ।  पथ जाये सुरमा , मिले नहीं क्षमा ,  जीवन व्यर्थ न जाये ॥टेक ॥  निंदक लोग करे मजबूर ,  पर्वतसे करे चकचूर ।  पीछे हटते नहीं है शूर ।  चाहे जल बरसाये , अग्नि जलाये ,  जीवन - कार्य न जाये ॥१ ॥  सज्जन लोग पिन्हाये माल ,  चंदन - फूल लगावे भाल ।  पूजासे ही न होते निहाल ।  अपनी टेक चलाये , अमल कर जाये ,  जीवन व्यर्थ न जाये ॥२ ॥  चाहे राज मिले या धन ,  सुन्दर स्त्री मिले मधुबन ।  बिगडा जाये नहीं यह मन ।  तुकडया अनुभव पाये ,  बात बताये , जीवन व्यर्थ न जाये ॥३ ॥ 

काहे पीता है शराब

  ( तर्ज मेरी दोस्ती , मेरा प्यार . )  काहे पीता है शराब ,  काहे पीता है शराब ??  धन भी गमाये , इज्जत न पाये ,  कुल बदनाम कराये ॥ टेक ॥  मानव का बडा दुश्मन ,  बिगडाता सरासर खून  इसकी बडी बुरी है धून ।  कैसे तुझे समझाये ?  कौन गति पाये ?  कुल बदनाम कराये || १ || काबू में नहीं है मन ,  बिगडाता सभी जन - गण ।  गाली बकता सदा पल - छन !  घर सारा दुःख पाये , जात सताये ,  कुल बदनाम कराये ॥२ ॥  सब घरदार भया कंगाल ,  पुत्रोंके हुए बेहाल !  तुकडया कहता जरा दे ख्याल ॥  तेरा पिना छुट जाये , सूख घर आये ,  कुल बदनाम कराये ॥३ ॥ 

मादकपर मात करो सद्गुण की

 ( तर्ज कौतुक किती ऐकवावे . )  मादकपर मात करो सद्गुण की  छोडो ये दारू,नशा ये तनकी ॥ टेक ॥  है कौन जो पिया और भला नाम किया ? जिसने न कभी गाली और गुफ्तार दिया ? धनसे , जनसे भी लाज गयी उनकी ॥१ ॥ ये व्यसनों की आदत ही तो खराब है ।  उनमें से अति खराब ये शराब है ।  नाश करे कीर्ति , पूर्ती अवगुण की ॥२ ॥ इन्सान ? तुझे मानपर ही चढना है ।  सत्कीर्ती करनेको प्रेम बढ़ना है ।  निर्व्यसनी होके शुद्धि करो मनकी ॥३ ॥  देवता की साक्ष तुझे पाना है ।  तब तो शुद्ध खान - पान लाना है ।  तुकडयाने बात कही भक्तन्की ॥४ ॥ 

मान कहा मेरा मान

 ( तर्ज मेरी दोस्ती मेरा प्यार . )  मान कहा मेरा मान ,  मान कहा मेरा मान ।  भोगके दिवाने , त्याग नहीं जाने ,  करके ही पाप फँसाये  मान कहा मेरा मान ॥ टेक ॥  जिसने त्याग दिया अभिमान ,  तन मनका मिट गया तुफान ।  उनको पाये प्रभूका ध्यान ,  जो करता है लूट , सरासर झूठ  करके ही पाप फँसाये ,  मान कहा मेरा मान ॥ १ ॥  जिनका सब जीवोंपर प्रेम ,  सेवाका जिसे है नेम ।  उसका ईश्वर चलाये क्षेम ,  यही तो गीता गाये ,  तू जान नहिं पाये ।  करके ही पाप फँसाये ,  मान कहा मेरा मान ॥२ ॥  हरदम कर प्रभूका गान ,  सन्तोंका सुनकर ग्यान ।  तबतो तेरा तरेगा जान ,  करके ही पाप फँसाये ,  तुकडया का सुन बोल ,  बात भई गोल ।  मान कहा मेरा मान ॥३ ॥ 

सन्तन का वख्त बडा कीमति है

 ( तर्ज - कौतुक किती ऐकवावे देवाचे )  सन्तन का वख्त बडा कीमति है ।  जितना भी हो सिखो , सू-मति है ॥टेक ॥  पूजा के वास्ते मंदीर बना ।  अवगुण के नाशका जंजीर बना ।  कीर्तन के स्थान वही देत गती है ॥१ ॥  साधू का बोध ही तो काफी है ।  सुनो , उनसे ही उद्धरते पापी है ।  करके दिखाओ न भूला जाय रती है ॥२ ॥  एक निर्भय सन्त - संग जो भी मिले ।  सारे जल जाये पाप , दोष गले ।  निर्मल होता है जीव , कहत श्रुती है ॥३ ॥  मैं इसलिये ही कहता हूँ बात बडी ।  अपनेही कहे उनको नाचे न घडी ।  तुकडयाका सार ज्योग - ज्युगती है ॥ ४ ॥

जो करना वह सोच समझकर

 ( तर्ज - अवचित आली वेळा बाई ! )  जो करना वह सोच समझकर ,  बिन सोचे सब धोखा होगा ।  दान करो तो पात्र समझकर ,  नहीं तो दान भी धोखा होगा || टेक || वह ब्राह्मण कैसे कह पाया ?  जिसने संध्या छोड दिया ।  पूजा जप - तप नहिं करता है ।  वह दानोंके पात्र न होगा ॥१ ॥  वह साधू कैसे हो सकता ?  जो जनकी सेवा न करे ।  खाली माला - तिलक लगाये ,  दानोंको ले रवाना होगा ॥२ ॥  दलित समझकर दान उठावे ,  शराब पीके गालि सुनावे ।  ऐसो को जो दान दिया हो ,  उन दानोंका फिर क्या होगा ? ॥३ ॥  छात्र समझकर दान दिया है ,  वह पढके भी गुण्ड भया है ।  नीती रीती कुछ नहिं समझे ,  उन दानोंका फिर क्या होगा ? ॥४ ॥  इसीलिये कहता हूँ ,  सुनिये - दान करो तो ग्यानी बनिये ।  तुकडयादास कहे , नहीं तो फिर ,  दान - धर्म भी धोखा होगा ॥५ ॥

सन्तन को पूजो नहीं , बात सुनो

 ( तर्ज- कौतुक किती ऐकवावे देवाचे )  सन्तन को पूजो नहीं , बात सुनो ।  पैरों पर झुको नहीं , याद सुनो ॥ टेक ॥  सन्तों की बातोंपर अमल करो ।  तन - मनसे ध्यान लगा , सफल करो ॥  एकहि क्यों सुनते ? सब साथ सुनो ॥१ ॥ तिलक फूल ,माल चढा सरको झुकाना ॥ आग्या के पालनको दूर भगाना ॥  इसीको ही कहते है घात , सुनो ॥२ ॥  सन्तों का ज्ञान , यही पूजा है ।  झुक गये तो फिर न रही दूजा है ॥  मिल जावो ज्योतमें ,भलीभाँती सुनो ॥३ ॥ शिष्य बनो तोभि उनके होके बनो ।  प्रेमी बनो तोभि सत्य लेके बनो ॥  तुकडया कहे ,बात ये दिनरात सुनो ॥४ ॥  

मुझको तो एक घडी वक्त नहीं

 ( तर्ज कौतुक किती ऐकवावे देवाचे )  मुझको तो एक घडी वक्त नहीं ।  मैं तो हूँ सेवक , कोई मुक्त नहीं ॥ टेक ॥  भारत के प्रीय सनत एक कराना ।  साधन भी भजन मेरा सख्त नहीं ॥ १ ॥  हो चाहे पंथ कोई , सब हैं बराबर ।  हो चाहे धर्म कोई , मुझको है कदर ।  पर इमानदार बिना भक्त नहीं ॥ २ ॥  पल-पल की कीमत पर प्रेम जमाना ।  किसकी हो बिगडी तो जाय मिटाना ।  मेरा है काम यही , रिक्त नहीं ॥ ३ ॥  मेरे दोस्तों ? ना भुलो याद मेरी  सेवा के काम करो , होके बरी ।  तुकडया है प्रेम , कोई तख्त नहीं ॥ ४ ॥ 

टेक रखी संकट में भक्तनकी

  ( तर्ज कौतुक किती ऐकवावे देवाचे ? )  टेक रखी संकट में भक्तनकी ।  विषयनसे लाज बजायी मनकी ॥टेक ॥  मन के ही नचे , नाच रहा था तन भी ।  जब इन्द्रियों में जोर करे अवगुण भी ॥  मुश्किल थी , सद्विचार चिंतन की ! ॥ १ ॥  किसकी भी चली ना मन को स्थिर करे ।  साधन भी लाख किये , बनमें फिरे ।  मर्कट की नायी घुमे पलछीन की ॥२ ॥  जब हृदय काँप गया , कुछ न बना ।  तुकड्याने नाम तेरा लेके धुना ।  सफल हुआ कामनाएँ दर्शन की ॥३ ॥ 

कैसे करूँ तेरा ध्यान ?

 ( तर्ज मेरी दोस्ती मेरा प्यार )  कैसे करूँ तेरा ध्यान ?  कैसे करूँ तेरा ध्यान ?  ये मन नहीं माने , फिरे अनजाने ,  समजत नाही बताये  कैसे करूँ तेरा ध्यान ? ॥टेक ॥  सब कुछ साथ लिया सामान ,  चन्दन - धूप - दिप महकान ।  करने पूजन , तेरा भगवान !  आसन कैसे लगाये ? प्राण चढाये ?? समझत नाही बताये ,  कैसे करूँ तेरा ध्यान ? ॥१ ॥  सुन्दर स्थान नदीके तीर ,  शिवजी का बडा मंदीर ।  बजती भेरी गगन - गम्भीर ,  कैसे नैन जमाये ?  स्थीर कर लाये ??  समझत नाही बताये ,  कैसे करूँ तेरा ध्यान ? ॥ २ ॥  मनकी धार बडी चंचल ,  चले चौफेर उडे पल - पल ।  उसको पाया नहीं है बल ,  करके धोखा खाये , बडा चकराये  समझत नाही बताये ,  कैसे करूँ तेरा ध्यान ? ॥३ ॥  गुरु - किरपा बिना नहिं पार ,  तुकडयादास कहे निरधार ।  चाहे लाख करो सिंगार ,  ऐसो अनुभव पाये ,  शास्त्र यही गावे समझत नाही बताये ,  कैसे करूँ तेरा ध्यान ? ॥४ ॥ 

चली किश्ती मँजधार

 ( तर्ज मेरी दोस्ती , मेरा प्यार )  चली किश्ती मँजधार ,  चली किश्ती मँजधार ।  रोके रूक ना जाये ,  ये दिल घबडाये ॥  अब कब धीर दिलाये ॥टेक ॥  जग - संसार बहे भरपूर ,  है मल्लाह नशे में चूर  नहीं अब मेरी चले मगदूर  कौन इसे समझायें ?  ये दिल घबडाये ॥ अब ॥ १ ॥  ऊपर बादल भरे घमसान ,  पडी धोखेमें अबके जान ।  छूटा है चारों ओर तुफान !  मोसे रहा ना जाये ,  दिल घबडाये ! ॥ अब ॥ २ ॥ तुकडयादास प्रभु के नाम ,  लेते दिल पाया आराम ।  संकट टले , फले सब काम  सद्गुरु राह बताये ,  ओ धीरज लाये  सब कुछ दुःख भुलाये ॥ ३ ॥ 

समझ न पाया मैं गुरु -गीता

 ( तर्ज - अवचित आली वेळा बाई )  समझ न पाया मैं गुरु -गीता ।  मैं तो भावुक हूँ दर्शनका ।  चरणोंमें फूल बहाता ।  यही है सार्थक मेरे मनका ॥ टेक ॥  गुरु की आज्ञा सिरपर धरना ।  प्राण जाय पीछे नहिं हटना ।  इतनाही सीखा हूँ मैंने ।  मुझको ज्ञान नहीं औरनका ॥१ ॥  मेरे सुख - दुख सतगुरु - पूजा ।  और मुझे आनन्द न दूजा ।  सारा जीवन करके निछावर ।  लाभ उठाऊँ गुरु सुमरनका ॥२ ॥  गुरुका वर्म गुरु ही जाने ।  हमतो उनके प्रेम दिवाने ।  गुरु उपदेशही बेद हमारा |  भेद मिटे सारे जीवनका ॥३ ॥  जनता बोले उनसे बाता ।  हमको बातोंसे नहिं नाता ।  तुकड्यादास कहे गुरु सूरत ।  देखेही सुख है नैननका ॥४ ॥ 

विद्या ही परम धन है नरका

 ( तर्ज - जा जारे अपने मंदरमां . )  विद्या ही परम धन है नरका ।  संग्रह है जीवनभर का ॥ टेक ॥  धन - सत्ता - तन धोखा खावे ।  विद्या साधन इह - पर का ॥ १ ॥  सब सुंदर में सुन्दर विद्या ।  काम नहीं उसको डर का ॥ २ ॥  जन्म अनेक बीते बदला कर ।  विद्या नहीं भूले सरका ॥३ ॥  जहाँ जावे , मानही पावेगा ।  प्रेम करे परके घर का ॥ ४ ॥  विद्या - हीन पशु कहलावे ।  पात्र नहीं वह आदर का ॥ ५ ॥  तुकडयादास कहे , सद्गुण हो ।  सफल रहे भव - सागर का ॥ ६ ॥

मुझे ही मालुम कौन हूँ मैं

 ( तर्ज - कुणास ठाऊक नाही असे . )  मुझे ही मालुम कौन हूँ मैं  लाज के मारे मौन हूँ मैं ॥ टेक ॥  इतनी उमर गयी है बीती ,  फिरभी नहीं पायी प्रभू - भक्ति ।  पापों से मन छूट न पाता ,  स्वारथ में बेचैन हूँ मैं ॥ १ ॥  बाहर चाहे साधू कहते ,  अन्दर तो शैतान ही रहते ।  इनसे निपटारा नहीं पाया ,  तबतक दूधमें लून हूँ मैं ॥ २ ॥  नामके खातर मरमरता हूँ किसका काम नहीं करता हूँ  अभिमानों के मारे झुरता ,  करके ही दुर्गुण हूँ मैं ॥३ ॥  तुकडयादास कहे - प्रभु मेरे ,  सदबुद्धी दे नामकी तेरे ।  अब तो मेरा अन्त सँवारे ,  जमघर का रह जाऊँ न मैं ॥४ ॥ 

किसे छुपा है , नाम तेरा

 ( तर्ज - कुणास ठाऊक नाही असे . )  किसे छुपा है , नाम तेरा ?  तूने भगत के काम करा ॥ टेक ॥  दिखनेको है पंढरपुरमें ।  पर दृष्टि तेरी घर - घर में  छुपा न तुझसे कुछ भी भगवन् ,  दिल कैसे है भला - बुरा ॥१ ॥  दुनियाँ चाहे बाहर देखे ।  तू तो अन्दर दिलकी परखे ।  जिनकी श्रद्धा - भक्ति सही है ,  उनकी हांकपे जात मरा ॥२ ॥  जिसने सतूकी नियत राखी ।  उन भक्तों की रख ली साखी ।  तुकड्यादास कहे , क्या गावे !  पत्थर को भी दिया तरा ॥३ ॥