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डिसेंबर, २०२२ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे

इक सद्गगुरु चरण बिना

इक सद्गुरु चरण बिना  फिर किसकी आस करूँ भाई ! || टेक || उनसे कौन बड़ा दुनियामें ,  मेरी नजर नाही |  संत महंत ऋषी मुनियोंने ,  उसिके गुण गाई ॥ १ ॥  देव धर्म सब उसके बांधे ,  काम करे साँई ।  जो जग - पालक सब दुनियाका ,  उसने बतलाई ॥ २ ॥  पतीत - पावन सद्गुरु मेरा ,  क्या कहुँ चतुराई ।  आप समान जगतको जाने ,  निज - रुप को पाई || ३ || शास्त्र पुराण न कुछ जाने हम ,  मन गुरु - पद ध्याई ।  तुकड्यादास कहे गुरु - पदसे ,  पार उतर जाई ॥ ४ ॥ 

अजि ! दो दर्शन महाराज

अजि ! दो दर्शन महाराज !  आज चरणों में आया हूँ || टेक || लख चौरासी भटकावत ,  यह नरतन पाया हूँ ।  अब कुछ लाज रखो मेरी ,  भवसे पछताया हूँ || १ || भव - सागर यह दुस्तर ,  जलसे जात बहाया  जम - डंडा सोसे नहि अब ,  यह अरजी लाया हूँ ॥२ ॥  मायारूप विषयनके मांही ,  जाय समाया हूँ ।  सुंदर काया बीत रही ,  नहि काज कमाया हूँ ॥ ३ ॥  दया करो प्रभुराज !  आजतक सीस नमाया हूँ ।  तुकड्यादास दरसबिन सारा ,  काम भुलाया ॥ ४ ॥ 

पिया मिलनका साज

पिया मिलनका साज  आज मोहे दिखलाओ रे || टेक ||  भटक रहा दिनरात ,  नहीं मिलता मिलवाओ रे ।  कौन भेषसे पावे प्रभुजी ,  मुझे पहराओ रे ॥ आज ० ॥ १ ॥  भगवा कपरा जटा बढ़ाकर ,  क्या वह पाओ रे ?  जिस साधनसे मिले जिगर ,  वह भेष चढाओ रे ॥ ५ ॥  क्या धून धरनेसे ईश्वर ,  नजरी आवो रे ।  ऐसा हो तो क्या धूनी  मुझको सिखलाओ रे ॥ ३ ॥  संत - चरण अरजी मेरी  यह दुःख मिटाओ रे ।  तुकड्यादास बिना प्रभु देखे ,  जन्म गमाओ रे ॥ ४ ॥

गुरु - चरण धर मनुजा

गुरु - चरण धर मनुजा !  तर भवसागर क्षणमाँही || टेक || काहेको शम दम और  साधन करता चतुराई ?  सद्गुरुराज कृपाल भजे तो ,  फेर जनम नाहीं ॥ १ ॥  जोग जाप करने नहि लागत ,  सहज कृपा पाई ।  आतम - ज्योत मिले हिरदेमें ,  सद्गुरु बतलाई ॥ २ ॥  काहेको यह जटा बढ़ावत ,  जगको भुलवाई |  दिलका पट खोलो गुरुपदमें ,  मिलता जदुराई ॥ ३ ॥  छोड़ आस घरदार पसारा ,  जा गुरु - गुण गाई ।  तुकड्यादास कहे बखती ,  फिरके ऐसी नाही ॥ ४ ॥ 

सद्गुरुराज दयाल

' सद्गुरुराज दयाल !  भरोसा अब मुझको तेरा || टेक ||  दरपे आकर बैठा हूँ अब  कुछभि करो मेरा ।  दया - नज़रसे देखो साँई !  हरो जनम - फेरा ॥ १ ॥  तरस रही यह जान हमारी क्यो करता देरा ? तुम्हरि कृपाबिन भटक रहा हूँ नही चुकता फेरा || २ || छोड काम दुनियाके सारे पग तुमरे छेरा चरणपे मोहे दे जगिया और तुम गुरु मै चेरा || ३ || पाप ताप सब काट करो मन शान्त करो मेरा तुकड्यादास आस धर तेरी हिरदे पग तेरा || ४ ||

कहे जनक सुनो शुक भाई

कहे जनक सुनो शुक भाई !  घटमें साँई गोरहा है । टेक ॥  जबतलक ' अहं ' नहि जाना ,  तबतलक झूठ भरमाना ।  आना वैसा चलजाना ,  जनना मरना भो रहा है ॥ १ ॥  मोहे कौन जिवन में लाया ,  नहि जाना फिर पछताया ।  आखिर में गोता खाया ,  बिरथा काया खो रहा है ॥ २ ॥  नहि आत्मरंग मन कीन्हा ,  सब बिरथा जगमें जीना ।  जप तपसे कुछ महि लीन्हा ,  आकुल सीना हो रहा है ॥ ३ ॥  निज - नैन पता पावेगा ,  फिर ' सोहं ' चित लावेगा ।  ओहं ' सब मिट जावेगा ,  तुकड्या धागा धो रह । है ॥ ४ ॥ 

कहे कृष्णनाथ अर्जुनको

कहे कृष्णनाथ अर्जुनको ,  आप अपनको जान प्यारे ! || टेक ||  जो आत्मरूप परकाशी ,  वहि सत्य जान अविनाशी ।  कभी जले न लागे फाँसी ,  काँप कफनका जा न प्यारे ! ॥१ ॥   जब टूटे नष्ट जड देही तू निकल जाय उससेही कुछ धोखा तुझको नाही वह जो साँई जान प्यारे || २ || ये सब तेरे बनवाये तू रुप न रुप समाये ये कहाँके गोत लगाये अपने रुप को जान प्यारे || ३ || मम अंशरुप परकासा तब जीव रुप धर आशा कहे तुकड्या एक तमाशा कोउ न दुजा जान प्यारे || ४ ||

कहे कपिलमुनी अवतारी

कहे कपिलमुनी अवतारी ,  क्यों अविचारी हो रहा है ? || टेक || यह सुख - दुख जोभी पाता ,  वह तेरेसे सब होता  क्यों आपहि करके रोता ,  गोता खाता जा रहा है ? ॥ १ ॥  जो आना जगमें पाया ,  वह तेरेसे तू आया ।  क्यों आकरके पछताया ?  मरना जीना गो रहा है || २ || सब तेरे हाथ में गुंडी ,  अब तोड कालकी मुंडी ।  ले प्रभू- नामकी झंडी ,  क्योंकर ठंडी सो रहा है ? ॥ ३ ॥  जैसा करता करनीको ,  वैसा भरना है तुझको ।  कहे तुकड्यादास गुरूको ,  जपके भारा ढो रहा है ॥ ४ ॥

कहे साँब सदाशिव भोला

  ' कहे साँब सदाशिव भोला ,  जपना माला आत्मरंगी ॥ टेक ॥  जहाँ खास मणीपुर ठाना ,  वहाँ श्वास रूपसे जाना ।  सुख - कुंडलनी ढलवाना ,  फिर बन जाना स्वात्मभंगी ॥ १ ॥  खुब एकसे एक मकाना ,  जहाँ विष्णू रुद्र - बिछाना |  फिर भूवर सुख अज़माना ,  रुपको पाना संतसंगी ॥ २ ॥  जब ब्रम्हरंध्रको पाया ,  फिर आप न दूजा आया ।  सब एकमें एक समाया ,  टूटे माया - फाँस जंगी ॥ ३ ॥  कहे तुकड्या अंतर होना ,  जब मजा मौजसे पाना ।  फिर सिद्धरूप बन जाना ,  जाना आना टूट भंगी ॥ ४ ॥  

गुरु ! कहो बात बतलाना

गुरु ! कहो बात बतलाना ,  कहाँतलक हमारा आना ? ॥ टेक ॥  ' सब मेरा ' करते करते ,  कई बार जिते और मरते जी ।  ' मैं कौन ' नहीं पहिचाना || १ ||  तकदीर बँधा क्या मेरा ,  नहि चुकता उसका फेरा जी ।  कब टूट पडे यह गाना ? ॥ २ ॥  कर माफ कसुरको मेरी ,  मैं शरण पडा हूँ तेरी जी ।  दर्शन दे , दीजो ग्याना ॥ ३ ॥  यहि बात सुनादो स्वामी !  तुम सबके अंतर्यामी जी ।  तुकड्या बन बाल दिवाना ॥ ४ ॥

साँवरिया ! मोहनि डारी

साँवरिया ! मोहनि डारी ,  फँसवाई जान हमारी || टेक ॥  घर कामधाम नहि सूझे ,  कुछ खा - पान नहिं रूचे जी  सब तनकी याद बिसारी ॥ १ ॥  धर मात पिताजी रोवे ,  नहि खाने ! भूखे सोवे जी  खुब दिया नशा सर भारी ॥ २ ॥  जो काम करनेको जावे ,  तू उसिमें आँख बतावे जी  दिल खेंच लिजाना जारी ॥ ३ ॥  क्या आग लगाई तनको ,  अब डारो प्रेम करनको जी ।  तुकड्या सब तोड करारी || ४ ||

दे भीख प्रभू ! दर्शनकी

दे भीख प्रभू ! दर्शनकी ,  पुरवा दे आशा मनकी || टेक || दुर्लभ तन मानुज पाया ,  नहि दर्शन मूक कमाया जी  सब व्यर्थ गई जीवनकी || पुर ० ॥ १ ॥  दर्शन बिन तरसे नैना ,  नहि रैन दिनोंमें चैना जी  सब भूली सुध इस तनकी । पुर ० ॥ २ ॥ बहु दूर देशसे आके हूँ खडा द्वारपे ताकेजी कर करुणा अब गरिबनकी || ३ || जगपाल तुम्हे कहलाते हो दीनोंके तुम दाते जी तुकड्याको कसम चरणनकी || ४ ||

तेराहि भरोसा साँई

तेराहि भरोसा साँई !  नहि कोइ मुझे यदुराई ! || टेक || सब अपना मतलब पाते ,  हरघडी मुझे फँसवाते जी भूलवाते कहकर ' भाई ' ॥ नहि ० ॥ १ ॥  कभि विवेक मारे ठोला ,  कभि छूटे मनका गोला जी कहि बुद्धी आप कराई ॥ नहिं ० ॥ २ ॥  कहि कुदरत खैंचा लेवे ,  कहि माया गोता देवे जी परतंत्र इसे बन जाई || नहि ० ॥ ३ ॥  कब मौका पार चढेगी ,  मुक्तीमें जाय पडेगी जी  तुकडया तन-आस लगाई ॥ ४ ॥ 

ए नाथ ! शरण हूँ तेरी

ए नाथ ! शरण हूँ तेरी  रखिये अब लाज हमारी || टेक || नही तुमबिन साथी मेरो ये चोर विषय तन घेरो जी अब आई बिपत्ती बडी भारी || १ || संगत संतनकी कीन्ही नही आशा मनकी छीनी जी भटकाना मनका जारी  || २ || पल पलमे दिल भटकावे मुख नाम नही प्रभु आवे जी मर्कटसम चंचलकारी || ३ || जय साधन कौन समाऊँ तुम्हे छोड कहाँपर जाऊँ जी तुकड्या तन आस उबारी || ४ ||

आना गल बीच हमारे

आना गल बीच हमारे ,  दिखलादे रूप पियारे ! ॥ टेक ॥  क्यों नाहक देर कटाते ,  नहि मनकी प्यास मिटाते जी ।  बिन दर्शन भूख जिया रे ॥ दिख ० ॥ १ ॥  जग महिमा गावे तेरी ,  बिन देखे शांति न मेरी जी ।  निर्धार यही रखिया रे ॥ दिख ० ॥ २ ॥  संतोंने गाया महिमा ,  परतंत्र हमारी सीमा जी  क्योंकर यह आँख किया रे ॥ दिख ॥ ३ ॥  देखे बिन शांत न होवे ,  ये इंद्रिय भूले रोवे जी  तुकड्या पग आस लिया रे ॥ दिख ॥ ४ ॥ 

वही कादरका कुदरती प्यारा

वही कादरका कुदरती प्यारा  जो जोतेजी तनको बिसारा || टेक ||  कभी नज़रोंमें दुई न आई ।  चाहे काबा हो बुतखान भाई  पाक खालिकसे नैना भराई ।  हार - जीत को पूरी हराई ।  सबमें होके रहे जो नियारा ॥१ ॥  'दादामिय्या ' की गति कुछ न्यारी ।  मस्त नंगा फिरे ब्रह्मचारी ।  हो उजारी या बरसे अँधारी ।  लाश अपनी गुफ्त कर डारी ।  दिया आशकको पूरा अधारा ॥२ ॥  संत ' सोमेश्वर ' गुरुराज साँई ।  जिसकी महिमा न हमसे कहाई ।  जिसने जंगलसे प्रीति लगाई ।  जिधर देखो उधर बादशाही ।  संत - संगतसे पूरा निहारा ॥३ ॥  ' फकिर बाबा ' की पूरी फ़कीरी ।  बालरूप हमें उमर गुजारी ।  भक्त पूरे जो निजको उजारी ।  आस तनकी मिटाई जी सारी  किया ब्रम्हनगरको थारा ॥४ ॥   एकनाथजी ' की सुनलो चटाई ।  सिद्ध पूरे दुआई मिटाई ।  लोग दुश्मन न कोई सगाई  भक्तजन निज लौमें लगाई  जोकि जाने वही जाँनिहारा ॥ ५ ॥ मस्त ' सीताराम ' अवलीया पूरा ।  काम क्रोधोंका किया जिसने चूरा |  लहरी बहरी नजर , नैन मोरा ।  सिद्ध बचनोंक...

एक संत जगत सुखदायी

एक संत जगत सुखदायी ।  जिया कमर जिन्होंने कमाई || टेक || कोई लाया न पाया जगतसे ।  कभी भूले नहीं निज मतसे ।  जैसे आये वहकी है गतसे ।  किया भक्त उद्धारा यह सतसे ।  दूइ दिलकी हमारे मिटाई ॥१ ॥  पूरा ' गैबी गुरुनाथ ' प्यारा |  तोडा पलमें यह भवका पसारा ।  लिया तापी किनारेमें थारा ।  जो कि साधक बने अवतारा ।  बात मुखसे जगत्‌से कहाई ॥ २ ॥  गुरु ' केजाजी ' भला संग पाया ।  जिसने तनमें विठोबा समाया |  संग होके निःसंग की माया ।  गंगाथड नैया पार लगाया ।  दास सेवा- मनोरथ पाई ॥३ ॥  संत ' बेंडोजी ' सुखसार प्यारे ।  जिसने कइ बोधसे लोक तारे ।  मस्त मौला सुरतके उजारे ।  जहाँ नहि काल जीके भरारे ।  भक्त भक्तीसे तनको समाई ॥४ ॥  माता जय ' जानकू ' अवतारी ।  जिसने अलमस्त उमर गुजारी ।  रहन करके बिदेही सुधारी ।  भई भवपार नैयाको तारी ।  माई निर्धारसे ज्योत पाई || ५ ||  ' मायबाई ' का पूरा पसारा ।  एक पलमें वह अडकोजी तारा ।  जिसने जगबीच नाम उद्धारा ।  खुला ब्रह्मनगर - दरबारा ...

धन्य धन्य जगत - परकाशी

धन्य धन्य जगत - परकाशी ।  जोकि तनमें बसे अविनाशी || टेक || कौन महिमा उन्होंकी कहावे ।  जाके ब्रम्हादिकोंसे न पावे ।  कहत कहना कहा मिट जावे ।  धन्य भाग जिन्हीको वह पावे ।  वेही करत दरस - अभिलाषी ॥१ ॥ गुरु ' नरसिंग ' भये भवपारा ।  सब त्याग दिन्हो परिवारा ।  किया विश्वजगत उजियारा ।  लौ लागी लगन ' हरि ' तारा ।  भये ब्रह्म - नगरके बासीं ॥२ ॥  नाथ रमते ' खटे महाराजा ' ।  जिचका झंडा जगतबीच गाजा ।  तोडा जनम मरन का बाजा ।  लिया बैकुंठ सुर दरवाजा ।  भये सिद्ध जगतसे उदासी ॥३ ॥  सुखसार ' गजानन स्वामी ' ।  बने पूरण अंतर्यामी ।  रूप नगन रहन है अनामी ।  भये दृश्य स्वरुप निजधामी ।  भक्तजनकी मिटावत प्यासी ॥४ ॥  भले मिय्या ' ताजुद्दीन बाबा ' ।  जिसने तनका बनाया है काबा ।  पूरा अवलीयापनमों है राबा ।  लहरी बहरी कऱ्यो है जबाबा ।  रिद्धसिद्ध बनाकर दासी ॥५ ॥  गुरु ' आडकोजी ' भये निर्बानी ।  जिसने ब्रह्मोसे ब्रह्म पछानी ।  मस्त आँखोंकी प्रेम - निशानी ।  डुले डुलते गये रूप ...

देखो आँखोंसे उलटा तमासा

देखो आँखोंसे उलटा तमासा ।  करो ब्रह्मनगर फिर बासा || टेक || झूठे बातोंका वहाँपे पसारा ।  भूला आँखों का देखनहारा ।  जानतोंका मिटा ज्ञान सारा ।  जहाँ देखा वहाँ उजियारा ।  कर सद्गुरु पद - अभिलाषा ॥१ ॥  बिन आँखी नजर आवे मोती ।  देखने बीन झलके वह ज्योती ।  बिन जबाओंसे बातें बरसती ।  बिना बाचे धड़क रही पोथी ।  खेले उलटा गगन एक मासा || २ || एक कर पाद बिन उड जावे ।  एक घंटा नगारा बजावे |  एक बिन पाँव नाच नचावे |  एक अलमस्त झोंके दिलावे ।  बिन डोरीका झूला सुखारा ॥३ ॥  सब ये एकीके रहे रखवारे ।  दूइसे भूल पाये बिचारे ।  जो अलखकी पलख आँख मारे ।  दास तुकड्या उसीसे जडा रे ।  एकके बीन बैठा है प्यासा || ४ ||  

मेरी मानो कही सुखदाई

मेरी मानो कही सुखदाई  बिन संगत मुक्ति न पाई || टेक ||  चाहे लाख बनो तुम जोगी ।  चाहे तनको धुनो मनभागी ।  चाहे खूब बनो धनत्यागी ।  चाहे रैन दिवस रहो जागी ।  तो भी मुक्ति न जान समाई ॥ १ ॥ साध साधत रहो मंत्रज्ञाना  साध साधत हो निर्बाना  साध साधत हो बात जाना  साधो आतमज्ञान बिराना ।  यह बंधन दूर न होई ॥ २ ॥  चाहे पंचअगन धर जाओ ।  चाहे पूरक कुंभक उठाओ।  चाहे आसन साधन पाओ ।  चाहे सुखकुंडली उठवाओ ।  निजगुरुबिन आँख न आई ॥ ३ ॥  कोई बाल औ भस्म रमाया ।  कोई बन बन धूनि जमाया |  कोई उलट टंगि करवाया ।  तोभी दिलका न भरम मिटाया ।  यह संतबचन सब भाई ॥४ ॥  कोई पंथमे मस्त रहे है ।  कोई पंथको दूर किये है ।  कोई पंथ नहीं यह कहे हैं ।  सब स्वारथसाथ बने है ।  कुछ दिलको न साफ कराई ॥५ ॥  यह झूठा नहीं सब योगा |  यह साधु करत सब भोगा ।  यह चित्त करत स्थिर रोगा ।  पर परमस्वरूप है नागा ।  यह जागा रहेसे न पाई || ६ ||  एक साधन यहहि बडो है ।  एक गुरुपद एकी जडो है ...

खोलो नैना भजो राम भाई

खोलो नैना भजो राम भाई ।  दिन बीता नजिक रात आई || टेक || जो कि करना सो करना निहारा ।  जिसे डरना सो हरलो पसारा  जो पकरना सो धरलो पियारा ।  वक्त खोया न आवे पुनारा |  भूल जावे सभी चतुराई ॥ १ ॥  जोरु लड़केसे मन मार डारो ।  याद घरकी शरिरकी बिसारो ।  खास ' अपना जो ' मै - तू ' बिसारो ।  जो कि अपना पता पाय हारो ।  होवे जन्नति - दार खुलाई ॥ २ ॥  भाई ! पलका नहीं है भरोसा ।  घडी पलमें उखड जावे श्वासा ।  अबसे कर अल्लाहकी अभिलाषा ।  नहि तो होगा फँसाई तमासा |  मेरि मानो कही सुखदाई || ३||  जो अंधारी नजरम्यान होवे ।  फेर नवमास गोता दिलावे ।  गोते चौऱ्यासी तुमको खिलावे ।  दास तुकडया यहीको कहावे ।  मिलनेसे दुखाई हुकाई ॥ ४ ॥ 

नर ! बिन बीता , भज राम राम

नर ! बिन बीता , भज राम राम ।  भज राम राम , सब तोड़ काम ॥ टेक ॥  बालकपन खलनमें खोया ,  तारुण विषयन - काम काम || १ || स्वारथ करकर जोड़ कमाया ,  भूलगया निजधाम धाम || २ ||  बूढेपनमें रोग सतावे ,  तन होगा बेफाम फाम ॥३ ॥  मौत रही कुछ देर जरासी ,  भटकेगा जम ग्राम ग्राम ॥४ ॥  जमका मार सीसपर बैठे ,  कुछ न पडे कोई काम काम ॥ ५ ॥  तुकड्यादास कहे मत भूलो ,  अब लेलो , प्रभु - नाम || ६ ||

नर ! प्रीत विषयको त्याग त्याग

नर ! प्रीत विषयको त्याग त्याग ।  सब छोड़ प्रभू-सँग लाग लाग ||टेक||  इन विषयनसे कौन तरा है ?  क्यों भूला अब जाग जाग ॥१ ॥  विषय नहीं यह नकं दुवारा ,  लख चौऱ्याँसी दाग दाग || २ ||  इन विषयनसे खाया गोता ,  बन बन ढूंढे भाग भाग ॥ ३ ॥  इन विषयनसे राज गमाया ,  भीख मँगे सब पाग पाग ॥४ ॥  जो तुमको कछु सुखकी आशा ,  तो भज ईश्वर जाग जाग ॥५ ॥  तुकड्यादास बिना प्रभु देखे ,  प्रीत नहीं वह फाग फाग ॥ ६ ॥  

नर ! तोरे घरवाको आग आग

नर ! तोरे घरवाको आग आग ।  मत देर करे , अब जाग जाग ॥ टेक ॥  रैन अँधारी चाँद न तारी ,  ज्वाल उठे जिम फाग फाग ॥ १ ॥ जगमग जगमग चमके ज्वाला ,  देख नयन मन लाग लाग ॥२ ॥  आग के ऊपर अमिया टपके ,  चेत गयी दिल दाग दाग ॥३ ॥  रंग अनेक न एकमी भागे ,  रंग अरंगत भाग भाग ॥४ ॥  खोल नयन अब देखो अगिया ,  दुर बैठा जम - नाग नाग ॥५ ॥  अनहद - फेर सुराग मधूरा ,  दर्श होत सब भाग भाग ॥६ ॥  तुकड्यादास कहे चित लाओ ,  आतमज्योत बिहाग आग ॥७ ॥

सुमरण बिन बिरथा काल काल

सुमरण बिन बिरथा काल काल ।  नर ! क्यों भटका  भ्रम-जाल जाल ॥ टेक ॥  हाथी घोडा माल खजाना ,  पलभर संपत डाल डाल ॥१ ॥  सुत मित नारी होत पियारी ,  अंतकाल फिर हाल हाल ॥२ ॥  नाति अनाती साथ न आवे ,  स्वारथकी सब माल माल ॥३ ॥  समझ सुजान ! मान कहि मेरी ,  क्यों खोता तन नाल नाल ॥४ ॥  तुकड्यादास कहे सुमरणसे ,  टूटे यह भव - जाल जाल ॥ ५ ॥

अरे मनुवा ! भज रघुनाथ नाथ

अरे मनुवा ! भज रघुनाथ नाथ |  मन भोगे भव अपघात घात ॥ टेक ॥  मात पिता वहि राम तुम्हारा ,  झूठी यह सब जात जात ॥१॥  धन दारा सुत साथ न आवे ,  सिरपर मारे लाथ लाथ ॥२ ॥  माल खजाना कौन किसीका ?  छूट पडेगा हाथ हाथ ॥ ३ ॥  तुकड्यादास कहे वहि मानो ,  जो अपने संग आत आत ॥४ ॥

उठ गडी ! जाग जरा

उठ गडी ! जाग जरा ,  वक्त क्यों गमाता है ?  बीत गई उमरी सारी ,  श्वास उडा जाता है || टेक || जाग पडे जो जो कोई ,  फेर फेर आना नाही ।  काल - मार खाना नाही ,  नींदपे फँसाता है ||१|| चोरका बजार सारा ,  काम क्रोध मारे मारा ।  विषयोंकी धारामाँही ,  और बहा जाता है ॥२ ॥ साधुसंत-संग अभी कर नाम प्रभुका वह लेकर ऊँची जगह जाय बसो काहे गोते खाता है ||३|| मानुजकी देह खोई  फेर वक्त कौन पाई तुकड्या तो सुनी सुनाई साथियो! सुनाता है ||४||

छाँडिये न नाथ ! दया

छाँडिये न नाथ ! दया ,  दर्शका पियासा हूँ ।  प्रेमको निभाना मेरे ,  धरी यही आसा हुँ । टेक ।  मीत नाहि गोत नाही ,  सभीसे निरासा हूँ जात नाहि पाँत नाही ,  सभी से अबासा हूँ ||१|| द्रव्य नाहि मंगल नाही ,  किसी जगह अंजल नाही साथिदार कोऊ नाही ,  तुहीसे उदासा हूँ ||२|| कर्म नाहि धर्म नाही ,  मंत्र नाहि तंत्र नाही शास्त्रका भी पाठ नाही ,  भावका हुलासा हूँ ||३|| जोग नाहि योग नाही ,  नेम नाहि प्रेम नाही ।  तुकड्याको ध्यान नाही ,  बना एक दासा हूँ ॥ ४ ॥ 

नैया मेरी भौर खाई

नैया मेरी भौर खाई ,  नाथ ! आय तारना || टेक ||  काम क्रोध लाटें छूटो ,  लोभ मोह चील्हें जूटी ।  ऐसेहि संसार माँही  आयके उतारना ॥ १ ॥  भवसागर - नीर भारी ,  जाउँ कैसे पैलपारी ?  घर लीन्ही आस तेरी ,  ब्रीदको सुधारना ॥ २ ॥ यह तो तेराही तमाशा ,  मै तो तेरी करता आशा ।  मोसे छुडाती हताशा ,  तूहि आके सारना ॥ ३ ॥  कर्म - बंध तूही मेरो ,  और कौन दूजो हेरो ?  राख लिजो तुकड्या चेरो ,  पैल जा उधारना ॥ ४ ॥ 

भोले ! तेरो रूप मेरे

भोले ! तेरो रूप मेरे ,  नैनमें मिलाय दे || टेक ||  मृगछाला मुंडमाला ,  नाग गला कंठ नीला गंगकी तरंग - धारा ,  नैन मोरे छाय दे ।। १ ।।  बूढ़ा बैल है सवारी ,  अंग भबूती उजारी ।  त्रिशुल शंख हाथ धारी ,  डमरुको हिलाय दे ॥ २ ॥  मंगके धतूरवाला  सीस चंद्र है रसीला ।  लंबी जटा नैन ज्वाला ,  कामको जलाय दे ॥ ३ ॥  गिरिजा नित संगमाही ,  चार भुजा शोभादायी ।  तुकडयाको देत सहाई  ध्यानमें डुलाय दे ॥ ४ ॥ 

नैनको हमारे तूने

नैनको हमारे तूने ,  खींच लियो सारिया ! ||टेक||  काम धाम सूध नाहीं ,  मान पान बूध नाही ।  बदनकी वजूद नाहीं ,  लाज डारि हारिया ॥ १ ॥  जमुना - जल भौर भारी ,  नीर सोरपे उबारी ।  कैसि आऊ पैलपारी ?  प्रेम - नाव तारिया ! ॥ २ ॥  बन्सरिका नाव प्यारा ,  कानको लगाम पूरा ।  छोडके भगी बलजोरा ,  देखे ग्वाल - नारियाँ ॥ ३ ॥  ससुर - सास - जाँच अपारा ,  देवर आ मारे मारा ।  तुकडया को तुम बिन सारा ,  झूठहि संसारिया ॥ ४ ॥