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मार्च, २०२३ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे

धन्य प्रभू ! करतार कलाबिन

धन्य प्रभू ! करतार कलाबिन !  खंब जगत तरकाय लिया || टेक ||   ऊपरसे जल नीचेभी जल ,  जलमें भूजल साँच रहा ।  उसपर बाग बना गहरा ,  इक नर और नार अकार किया ॥ १ ॥  उन दोनोंके रुप रंग बहुत ,  जिनका न कोईभी माप करे ।  इक मायाजाल बिछाकरके वहाँ  न्यारा मास दिखाय दिया ॥ २॥  आपही आप भरा सबमे ,  यह घूंघट ऊपर ले करके |  तुकड्या ' कहे जो तुझको सुमरे ,  उसिको निजरूप बताय दिया ॥ ३॥   

जाग मुसाफिर ! देख जरा

जाग मुसाफिर ! देख जरा  यह काम तेरा सब भूल गया || टेक ||  खास मकान भुला अपना ,  अरु दुसरेके घर राब रहा ।  मालिक होकर खिलकतका ,  क्यों चाकर भेष बढाय लिया || १ ||  राज गया सब नींदनमें ,  अरू काज गया भोलेपनमें ।  कहाँतक सोता बैठा है ?  यह चोरन संग उठाय लिया || २ || बीत गयी उमरी सारी ,  अब मौतमें भी कुछ देर नहीं ।  खास पता करके अपना ,  फिर कालनका डर दूर गया || ३ || छोड़ जगतकी लालचको ,  किस चोर - इजाजत बैठा है ।  तुकड्यादास कहे जागो अब ,  गुरू - चरण क्यों दूर किया ? || ४ || 

आशक क्या जगको समझे

आशक क्या जगको समझे ?  वह तो दुनियासे न्याराहि रहे । टेक ।।  पाप न जाने , पून न जाने ,  धर्म - कर्म कुछभी न करे ।  मस्त बसे तन - अंदर में ,  परमेश्वरका प्याराहि रहे ॥ १ ॥  क्या जगको समझाना है ?  उसे देखत पूरण काज भये ।  पाप कटे दर्शन करते ,  वहाँ प्रेमकी जलधाराहि बहे ॥ २ ॥  मरनेका डर है न जिसे ,  जोकि तनमें मरन मिलाय लिया ।  मुक्त सदा जगमेंहि रहे ,  वहाँ मरन - जिना माराहि रहे ॥ ३ ॥  धन्य उसीके भाग बड़े ,  दो चरण धरे उसके मनसे ।  तुकड्या गुण कुछ गात नहीं ,  इस सेवामें सारहि रहे ॥ ४ ॥ 

संतो ! संतनकी गत प्यारी

संतो ! संतनकी गत प्यारी ॥टेक ॥  नहि कछु माँगे भीख - भिखौवा ,  नहीं आप हितकारी ।  वे तो साधनसे है न्यारे ,  टूटी ' मै-तू ' सारी || १ || नहि चाहे कुछ पाप - पुण्यको ,  रुचिर भोग परिवारी ।  वे आतमसे लाग पडे है ,  हारी देख बिगारी || २ || नहि चाहे कछु सुखकी आशा ,  नहि माँगे दुख भारी ।  नहिं बांधे कछु जन्म - मरणसे ,  सबसे प्रीत पियारी || ३ || दीन नहीं अरु रैन नहीं जहँ ,  नहि बादल - अंधारी ।  नहीं उजारा पर - परकासा ,  आपहि खेल - खिकारी ॥ ४ ॥  नहि कछु स्वर्ग मृत्यु पाताला ,  तीनहु देह निवारी ।  वे तो सबके परे बसे है ,  निरक्षरहि निर्धारी ॥ ५ ॥  आपहि आप समाया निजमें ,  लगी ब्रह्म की तारी ।  होकर साक्षी सब इंद्रियका ,  देखे मौज पियारा ।। ६ ।।  नहि भूले रिद्धी- सिद्धीसे सीधो जात उजारी परा-परे पर लेटत जाकर जाप-अजापा हारी || ७ || तुकड्यादास कहे बिन संगत नहि पावे पद भारी बिरलाही जा पहुँचे उसमे जो कोई अर्थ बिचारी || ८ ||

झूठ पसार भया जग में ,

झूठ पसार भया जग में ,  अब आपहि आप बिचार करो ॥ टेक ||  स्वारथकी साथी दुनिया ,  बिन स्वारथ सारथ कौन करे ?  चाहे संत रहे कि महंत रहे ,  सब सोच सम्हल जिगरार करो ॥ १ ॥  संड धरम मँगने निकले ,  धर अंग मुलाम भगा कपरा |  खूब भेष बढाय लिया तनमें  उनसे न कभीभी प्यार करो ॥२ ॥  शास्त्र पुराण बहोत कहें ,  मतसे मत एक नहीं मिलता ।  सत्य विचार करा करके ,  फिर आपमें आप मिलार करो ॥३ ॥  तन - लकडीके बलपरही ,  कोइ बात बनी चल आवेगी ।  यह वक्त गया फिरसे न मिले ,  तुकडया कहे काम सुधार करो ॥ ४ ॥ 

संतो! बिकट रहन-निर्धारा

संतो! बिकट रहन-निर्धारा || टेक || दुनिया तजकर जंगल बैठे  अंग बारि-तप - धारा  दुनियाका तो संग न छुटा  पाप बढ़ावत भारा || १ || खाना पीना सुखसे होना ,  ऐसी उमर गुजारा दिला  ग्यान ध्यान कबहू नहि साधे ,  हसते रैन बिसारा || २ || जब तक अंग न आय उदासी ,  तब सब ढोंग-धतूरा  बिरला कोऊ जंगल पावे ,  भोगत कष्ट अपारा || ३ || नहि आशा रहने बहनेकी ,  अंतर - तार पियारा |  तुकड्यादास कहे वह पावे || ४ || 

प्यारे ! तेरी बिगडी कौन सुधारे

प्यारे ! तेरी बिगडी कौन सुधारे ? ॥टेक ॥ जबतक धन दौलत परिवारा ,  सब कोइ नाम पुकारे ।  कीचड में फँसगयि नौका तो ,  भग जाते घर सारे ॥ १ ॥  चलतीकी साथी दुनिया है ,  पडी न कोई तारे !  जबतक जाम तनूमें तेरे ,  तबही मौज किया रे ! ।। २ । ।  आमदसे खर्चा करता यह ,  अंतकालमें हारे ।  दाग पडी कुमती काटनको ,  तब जमराजा मारे ॥ ३ ॥  कहता तुकड्या ख्याल करो बे !  क्यों सोते हो प्यारे ।  सोनेसे यह मौज गयी फिर ,  भोगो पतन अपारे ।। ४ ।। 

सद्‌गुरु - धाम बिकट है भाई

सद्‌गुरु - धाम बिकट है भाई ! ॥ टेक ॥  जो कोई निज - ग्राम चलेगा ,  लगे पाँच दरवाई ।  महाद्वारपर नाक कटावे ,  सोहि चले भितराई ॥ १ ॥  लगे दूसरा दार वहाँपे ,  होवे जींह कटाई ।  बिन काटेसे कोउ न जावे ,  देवत संत गवाही ।। २ ।।  तिसरा दार लगे मँझघरका ,  काटे कर करताई ।  बेद पुराणहि गर्जत सारे ,  देख पडे प्रभुताई ॥ ३ ॥  चौथा दार बडा बिहराना ,  होवे कान - छँटाई ।  बाहरका वह कछु नहि जाने ,  सुनता नाद - दुहाई ॥ ४ ॥  लगे पाँचवाँ सुन्दर द्वारा ,  जहाँ सीस - उतराई ।  जगमग ज्योत पडे नजरोंमे ,  क्या गाऊँ कथवाई ॥ ५ ॥  रैनदीन अरु छीन नहीं जहँ ,  अखंड भेदा पाई ।  तुकड्यादास कह बिकटीसे ,  बिरला धाम चलाई ॥ ६ ॥ 

सद्‌गुरु अगम अगोदर भाई !

सद्‌गुरु अगम अगोदर भाई ! ॥ टेक ॥  क्या कहिये उनकी रहनीको ,  पता नहीं किन पाई ।  ब्रह्मगिरीमें बास जिन्होंका ,  अंतर मित वह साँई || १ || क्या जाने व दुनिया - दौलत ,  झूठी लोग- लुगाई |  अमृत - धार किनारा जिनका ,  देवत बेद गवाही || २ || क्या माने वह धर्म - कर्मको ,  आपही कर्म हुआई ।  सुन्न शिखर आसन दृढ जिनका ,  बाजत मेर - दुहाई || ३ || निर्मल प्रेम बसे जिनके घट ,  वहिपर करत कृपाई ।  तुकड्यादास चरण पर तिनके ,  गावे धून - धुनाई || ४ || 

प्रभु ! मेरी प्रीत तुम्हींसे लगाना

प्रभु ! मेरी प्रीत तुम्हींसे लगाना |  हरदम नैनन छाना || टेक ||  और न चाहत धन सुत दारा ,  दौलत माल खजाना |  रं - रंगीली तन दिन्हि मोहे ,  आखिर पास समाना || १ || काम क्रोध मद मत्सर सारे ,  ध्यानमों तेरे मिलाना ।  तुकड्यादास आसरा तेरो ,  और नहीं मन माना || २ ||

अब मै अपने पिया - संग लागी

अब मै अपने पिया - संग लागी ।  रैनदीन रहूँ जागी || टेक || मारूँ मार काम - क्रोधनको ,  बनाहि डारूँ बिरागी ।  तोड़ कुलूप किंवाडे खोले ,  इस घरसे वह भागी || १ || यह तो सब दिखवावनका है ,  जैसो बाँझ जनागी ।  झूठा जाल रचा नैननमों ,  देख पड़ा तब त्यागी || २ || तीनहु ताल राज सब तिनको ,  कौन कहे अब बागी ।  तुकड्यादास कहे सदगुरु बिन ,  रहती थी नित नागी || ३ ||

मेरी प्रभु दीननको दुख सहतो

मेरी प्रभु दीननको दुख सहतो ।  निरंतर भक्तनके संग रहतो ॥ टेक ॥    कभु तो खेचत ढोर चोखको ,  कभी जनीसंग धोतो ।  कभु तो चीर बढ़ावत तिनको ,  कभी नीच - मुख कहतो ॥ १ ॥  कभु तो काम करत भक्तनको ,  कभु खंबासू आतो  कभु तो जाकर जलके अंदर ,  मुक्त गजेंद्र करातो ॥ २ ॥  कभु तो खेलत नित लडकनमों ,  ग्वालबाल संग खातो । २ ||  तुकड्यादास कहे नहि यह तो ,  वह सब खेल खिलातो ॥ ३ ॥

जगमे ! हीरा मिलत कठिना

जगमे ! हीरा मिलत कठिना |  कोइ बिरलेने चीन्हा || टेक || क्या घर घर साधू फुर आया ,  तो वह जाय पछाना ।  बिन सागर नहि उपजे मोती ,  और जगह सब सूना ॥ १ ॥  जो कोइ होत रंगको रंगिया ,  सो रंग भर भर चीन्हा ।  नुगरोंके मन भूल बसत है ,  गोते खाय दिवाना ॥ २ ॥  अपने हेत नेत बदलाकर ,  घुमता है मनमाना ।  सो क्या तार - तरैया किसको ?  डूबे लेय जहाँना ॥ ३ ॥  मत भूलो ऊपरके रंगको ,  जब देखो अज़माना |  तुकड्यादास बिना सद्गुरुके ,  नहि पावत कहुं ग्याना ॥ ४ ॥ 

अहो गुरु ! काल बिकट आयो है

अहो गुरु ! काल बिकट आयो है ।  सब जग भ्रम छायो है || टेक || कहँ तो बिकत मोतिसम फूगा ,  बाहर - रंग भायो है ।  आप मरे औरनको मारे ,  कोउ न सुख पायो है ॥ १ ॥  सब अपनी अपनी बतलावे ,  दौरत भ्रम खायो है ।  ' तू मेरा में मेरा ' समझे ,  काम - कपट न्हायो है ॥ २ ॥  कबहू न नेम-धरमको पाले मतलब गुण गायो है दुर्लभ नाम तुम्हारी मुखमे सब रँग रँग भायो है || ३ || क्या कहिये अब न बने कहते जाल निकट आयो है तुकडयादास कहे किरपा कर सब दुख टल जायो है || ४ ||
अहो गुरु ! कौन सु - मारग धरिये ,  भवजल पार उतरिये || टेक || चंचल मन रोका नहि जावे ,  नितउत भटकत फिरिये  स्थीर जरा पलपरभी न ठहुरे ,  और और बल हरिये || १ || योग जाप करनेको जावे।    लोभ मदादिक भरिये  इंद्रिय - आशा - पाश न छूटे ,  भौर भौर कर फिरिये  || २ || परमार्थको साधन लाग्यो ,  स्वारथ आन बिचरिये  नीचऊँच दिल भाव बसत है ,  क्या कहाँ जाकर मरिये ? ॥ ३ ॥  तुम तो नाथ ! दयाके सिंधू ,  तुमहीसे मन लरिये ।  तुकड्यादास बिना गुरु किरपा ,  कैसे अँधारी टरिये ? ॥ ४ ॥ 

मोसम कौन कुटिल खल कामी

मोसम कौन कुटिल खल कामी ?  तुम प्रभु । अंतरजामी || टेक || रैन दिवस विषयनको आशा ,  न किसे करत ' नमामि '  दिनदिन छिनछिन निंदक बोलूं ,  बनुं कैसे निजधामी ? || १ || साधु - संतको कबहु न पूजे ,  अभिमानी तन स्वामी !  स्वारथमें सारथसम डोलूं ,  न रहूँ किसिका प्रेमी || २ || आशा - मनशा घरदारनमें ,  तिरिया सुतको हामी ।  तुकड्यादास दया कर हमपे ,  नहि तो व्यर्थ गुलामी || ३ ||

अहो प्रभु । तुमहीसे मन राजी

अहो प्रभु । तुमहीसे मन राजी ,  और हमें नाराजी ॥ टेक ॥  जप तप साधन नमाज रोजा ,  कर - करके मति साजी ।  काजी मुल्ला पढ़ते पढ़ते ,  अंत बने हैं पाजी ॥ १ ॥  बुतखाने और काबे तीरथ ,  सब पैसोंके खाजी ।  बेद पुराण कुराना कलमें ,  करे तुम्हारी हाँजी ॥ २ ॥  बैरागी संन्यासी कितने  बढे बने निर्लाजी |  भक्ति झरा कोई बिरला जाने ,  सब ये तो कोकाजी ॥ ३ ॥  पीर - पंगम्बर बलि - अवलिया ,  मस्त बने मनमाँ जी ! |  खबर नहीं दुनियाकी उनको ,  आपहि डोले गाजी ॥ ४ ॥  हम तो नमक हरामहि बैठे ,  हमसे सब नाराजी ।  तुकड्यादास दास कहे करुणा कर ,  भूल गये सारा जी ! ॥ ५ ॥

प्रभु ! मोहे आखिर कौन तरावे

प्रभु ! मोहे आखिर कौन तरावे ? ।  जब यह देह हरावे || टेक ||  दिन दिन काया खावत झुरनी ,  जैसे झरन सुखावे ।  कोउ न पूछे अंतकाल में ,  आप अकेला जावे ।। १ ।।   अब तो मित्र गडोगण सारे ,  और और बुलवावे जब तन सारी सुत्र पडेगी ,  तब को दुःख उठावे ? ॥ २ ॥  अब तो राज - अमिरकी संगत ,  जो खावे सो पावे |  गरचे इसमें भूल गये तो ,  जन्म - फेर भटकावे ॥ ३ ॥  तुमही हो तारक दुनियाके ,  दो अब ग्यान जरा वे ।  तुकडयादास नहीं फिर समझे ,  झूठा नर्क उठावे ॥ ४ ॥  

प्रीती मत छोडे गिरिधारी

प्रीती मत छोडे गिरिधारी !  हम तो दोन भिखारी | टेक | लख चौरासी भटकत आये ,  जब तन पाय मुरारी ! |  अब कुछ लाज रखो दीननको ,  नहि तो जा भव - धारी ॥ १ ॥  नहि कुछ चाहत दाम जवाहर ,  भूखा दरस निहारी ।  आन पडे जब अंतकाल तब ,  लीजो हाक हमारी ॥ २ ॥  और न करत करारहूँ तुमसे ,  बिन देखे गिरिधारी ! ।  तुकड्यादास पास कर लेना ,  जब वह काल निहारी ॥ ३ ॥ 

मेरे प्यारे ! साथ में कुछ तो लिजाना

मेरे प्यारे ! साथ में कुछ तो लिजाना ।  रहगया माल खजाना | टेक | कौडी कौडी जोड़ कमाई ,  मोति जवाहर नाना !  अंतकाल सब ठाठ पड़ा है ,  स्पेशल रेल बनाना ॥ १ ॥  ' यह मेरा वह मेरा ' कहकर ,  खूब बढाया दाना ।  मोहबत कर कुछ कालसे कहना ,  कुछ दौलत दे - देना ॥ २ ॥  नहि माने जो तेरा कहना ,  भैया जामिन देना ।  नहि तो जाना तुम्हें मुभा है ,  सँग धोती ले लेना ॥ ३ ॥  काहेको यह शौक बढ़ाना ?  आखिर जात नगीना ।  तुकड्यादास कहे अंधे हो !  राम भजो मनमाना ॥ ४ ॥ 

साधो भाई ! रहगयी झोलि तुम्हारीं

साधो भाई ! रहगयी झोलि तुम्हारीं ।  रोति है माला बिचारी || टेक ||  दंड कमंडल भंगका लोटा ,  पड़ि है कमलिया कारी ।  छोड़ चले कंसे इनको अब ,  क्या लो साथ अँधारी ? ॥ १ ॥  सुनी पडी है संग धूनिया ,  झोपडि सोई बिचारी ।  ऊठ चले आखिरमें नंगे ,  खुली लँगोटी सारी ॥२ ॥  चिमटा तो मट्टी में बैठा ,  लटकी खूंट तंबोरी ।  छोड़ चले कैसे इनको अब ,  कुछ तो लिजाओ धतूरी ॥ ३ ॥  काल - तमाचा सब पर बीते ,  नर हो या कोई नारी ।  तुकड्यादास कहे प्रभुके बिन ,  बन गये अंत भिखारी ॥ ४ ॥ 

काहेको बन बन बिचरत भाई

काहेको बन बन बिचरत भाई !  घट बिच तेरो साँई ॥ टेक ॥  मनको काम अचल धुम घेरो ,  क्या तुझको फिरवाई ।  अंतर जाग बिवेक सुधारो ,  मनही ज्ञान बताई ॥ १ ॥  सत् संतन - सँग प्रेम कराकर ,  निर्भय मुद्रा पाई ।  जहाँ देखे वहाँ ईश्वर - चर्चा ,  दूजा नज़र न आई ॥ २ ॥  ' मुझमे राम राममें में हूँ '  यह दिल भाव ठराई ।  काम सकाम धाम नहि ग्रामा ,  जहँ वहँ ईश्वर गाई || ३ ||  निंदा करूँ न किसकी तारिफ ,  बात वही मनमाँही ।  तुकड्या देह गेह भूलेपर ,  निर्भय पदको पाई ॥ ४ ॥

नर ! तोहे कैसी भूल परी

नर ! तोहे कैसी भूल परी ? ।  पासहिमें गठरी || टेक ||  तीरथ जाकर न्हावत जलमें ,  काया धोय धरी ।  मन तो जार - करममें दौरे ,  आँखों धूल भरी ॥ १ ॥  मंदिर जाकर मूरत पूजी ,  बही बेल - पतरी ।  सूरत तो आँखों नहि आई ,  नाहक देर करी ॥ २ ॥  जिसके जोश रोषसे भागे ,  सब दुनिया - नगरी |  वह चैतन्य समाया तुझमें ,  वहि है अलख हरी ॥ ३ ॥  तुकड्यादास कहे लख लखुआ ,  साखी देत भरी ।  जिससे देखे वहिको देखो ,  देखनको बिसरी ॥ ४ ॥ 

करना सब करनीको लागा

करना सब करनीको लागा ।  तू पहलेहि निसंगा || टेक ||  कर्मरूपको साक्षी होकर ,  क्यों लगवाता डागा  डाग वही भासनसे भासे ,  तू निर्लेप निरंगा ॥ १ ॥  द्रष्टाभी दृश्यहिसे कहिये ,  नहि तो तू नित नंगा ।  नंगहि मास रंगको दीन्ही ,  तू सबहीसे अनंगा ।। २ ।।  तुझमें नहि है बंध ,  बंधसे न्यारा तूहि अभंगा ।  सत्संगत कर ज्ञान जानकर ,  तब फीटयो मन - पांगा ॥ ३ ॥  जबलौं प्रीत नहीं परतीती ,  तबलौं भूल न संगा ।  तुकड्यादास कहे अज़माले ,  हो अनुभवसे जागा ॥ ४ ॥ 

साधो ! नाम बिना गति नाहीं

साधो ! नाम बिना गति नाहीं ।  सब नामहुसे पाई ॥ टेक ॥  नाममंत्र सुमरो कलजुगमों  और न कोई कमाई ।  नामहिसे सब संत उद्धारे ,  राखो प्रेम लगाई ॥ १ ॥  योग याग कछु काम न आवे ,  भटके मन दिशा दाही ।  अंतर प्रेम करो प्रभु - सुमरण ,  मुक्त करे पलमाँही ॥ २ ॥  नामको महिमा कोउ न जाने ,  अजब नाम - प्रभूताई ।  जिस नामहिसे रटते शंकर ,  शीतल अंग कराई ।। ३ ।।  नामसरीखी दवा न कोई ,  जो भवरोग हटाई ।  अजामील इक नाम उचारा ,  कोटिन पाप कटाई ॥ ४ ॥  सबकी आण छोड कामनको ,  रामहि राम रिझाई ।  तुकड्यादास कहे वह तरता ,  पूरा भरोसा भाई ! ॥ ५ ॥ 

संतों ! आतम - धूनि जलाना

संतों ! आतम - धूनि जलाना |  काहेको माँगता दाना ? | टेक | नहि माँगे मोती मिल जावे ,  माँगे भीख न पाना  करम - धरमकों कबह न छोडो ,  पावे पद निर्बाना ॥ १ ॥  काहे तनपर खाक रमावे ,  आशा - भस्म लगाना ।  विवेक - चिमटा करमें लेकर ,  अंतर अलख जगाना ॥ २ ॥  दया - प्रेमकी तुंबडी लेकर ,  ईश्वरके गुण गाना |  काम - क्रोधकी लकडी करमें ,  दुर्गुण पार हटाना ॥ ३ ॥  सहजस्वरूप मगन हो बैठें ,  जो चाहे मनमाना ।  तुकड्यादास कहे सब पावे ,  काहे भटकत जाना ॥ ४ ॥ 

भाई ! तब भयहूँ परकासा

भाई ! तब भयहूँ परकासा ।  जब टूटी घट - आसा | टेक |  जबतें भेद द्रोह मत कामा ,  तबते झूठ तमासा ।  सत्य - विवेक जानकर करहीं ,  राखे वृत्ति उदासा ॥ १ ॥  सब घट एकहि राम भऱ्यो है ,  ऐसो करि निजध्यासा  छोड पाश विषयनके संगा ,  रंग्यो भक्ति उल्हासा ॥ २ ॥  नहि कहुँ ऊँच नीच जग भाई !  ये सब भाव उभासा |  जाने जानत वृत्ति लीन हो ,  टुटा झगडा - झ्यासा ॥ ३ ॥  तबलों आठहु जाम बिहर  अंदर एकहिको प्यासा |  तुकड्यादास प्यार भर पायी ,  जिम जलबीच बतासा ॥ ४ ॥ 

प्यारे ! क्यों प्रीतमको त्यागा

प्यारे ! क्यों प्रीतमको त्यागा ।  इस दुनिया सँग लागा ॥टेक ॥  जबतक राजी रहे फुलारी ,  बाग दिखे सब रंगा  फुलवारी जो बदल गया तो ,  भासे जैसो फागा ॥ १ ॥  जहाँतक राम - भरोसा राखें ,  सब दौरे दे संगा ।  राम जबाँसे छूट पडे तब ,  भटके भागा भागा ॥ २ ॥  जिसने यह सब मौज दिलाया ,  धन - दौलत गज - पागा |  कालगती जो बदल गयी तो ,  पलमें होबत नागा ॥ ३ ॥  तुकड्यादास कहे मत भूलो ,  यह सद्गुरु पद जागा  अलख निरंजन मज दिलमाँही ,  कालनका डर भागा ॥ ४ ॥ 

जो नर अपना घर नहि जाने

जो नर अपना घर नहि जाने ।  तौलग रहत दिवाने ॥टेक ॥  जबलग दीप न मिले पतंगा ,  तबलग भ्रमत भनाने ।  दीप मिले आशिक बन जावे ,  नहीं मौतको माने ॥ १ ॥ तैसो प्रेम लगे नही प्रभुसो भटके काननम्याने निर्मल भक्ती मिले हिरदेमों रटे न छोडे ताने || २ || जबलौं सुख-दु:खनको देखे तबलौं प्रीत न जाने तुकड्यादास कहे इन्हे छोडे सो घर - राह पछाने || ३ ||

मानस मनहीसे दुख पावे

मानस मनहीसे दुख पावे ।  तिहुँ चौरासि फिरावे || टेक || मनही होत बधीर कर्मको ,  मनही भव छुट जावे ।  मनही पावत ब्रह्म - अनूपम ,  मनही भौर घुमावे ॥ १ ॥  जबलग मन सत्संग न रंग्यों ,  तबलौं झूठ बरावे ।  सद्गुरुसंग मिल्यो जब मनको ,  तो मन मौज उड़ावे ॥ २ ॥  जबतक मन निर्धार न राखे ,  तब बिरथा फल होवे ।  तुकड्यादास कहे मन  ईश्वर- प्रेमबिना नहिं धोवे ॥ ३ ॥