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जून, २०२२ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे

भारत के जनहितवादी ,

 ( तर्ज – विश्वास पैं क्यों बैठा है ! )  भारत के जनहितवादी ,  सब चाहते थे आजादी ।  कइ लगे हुए थे इसमें ,  कितनों को मिली समाधी ॥ टेक ॥  सुभाष बाबू ' सैन्य कर गये ,  देश - विदेश में जाके ।  ' मोतिलाल नेहरू ' ने अपना ,  कुलही दिया बहा के ॥  वह ' तिलक बाल गंगाधर ' ।  सहे जिसने कष्ट निरंतर ॥  वैसे हि ' वीर सावरकर '  क्या क्या नहि भोगी व्याधी ? ॥ १ ॥ ' लाला लजपतराय ' शेर थे ,  ' श्रद्धानंद ' विरागी ।  मौलाना आजाद  सरोजिनि ' ,  वल्लभभाई ' त्यागी ॥ '  तात्या ' और ' लक्ष्मी रानी ' ।  जबसे यह शुरू कहानी ॥  वह काण्ड जलियनवाला ,  वह ' जतींद्र ' की बरबादी ॥ २ ॥ ' भगतसिंह ' तो चढा शूलिपर ,  साथी ' बटुकेश्वर ' था ।  कितने नाम बतायें उनके ?  जिनका जेल हि घर था ॥  आष्टी , चिमोर और ब्यावल |  कितने ही शहीदों के स्थल ||  आजादी के उस जंग में ,  लाखों ने जान लटा दी ॥ ३ ॥  आपस में मतभेद सही था ,  मार्ग भिन्न थे सबके ।  हिंसक कोई , क्रांतिवीर थे ,  कोइ...

मनमें राम , काम हो कर में

 ( तर्ज - भारत शानदार हो मेरा )  मनमें राम , काम हो कर में ||  मन में ० ॥ टेक ॥  अपने बलपर , रहे जगत में ,  पराधीन नहि , धन मे मुफ्त न खाये , भीख न माँगे ,  प्रेम रखे हर घर में ॥ १ ॥  आओ बैठो सब मिल गाये ,  प्रेम-प्रभू को स्वर में ।  माला - कण्ठी शान्ति सुखावह पड़ी रहे अन्दर में ॥ २ ॥  बाहर देख - दिखौआ ना हो ,  रहे इन्सानी स्तर में ।  जैसे सती - पती की प्रीती को समझे बाहर में ? ॥ ३ ॥  घरमे हो बाहर में वैसा ,  प्रेम भरा लोगन में ।  तुकड्यादास भक्त वहि जानो ,  डुले विश्व - मन्दर में ॥ ४ ॥

दिलसे जपो , चाहे मुंह से जपो

 ( तर्ज - हम है भले बुरे ... )  दिलसे जपो , चाहे मुंह से जपो ,  नाम जपने से  उद्धार होता हि है ||टेक ||  चिन्तन है सच्चा , दृढ होगी इच्छा ।  निर्मल सदाचार , फलसे अनिच्छा ।  सादा ही जीवन बना रहो ।  अजि ! चलते कहो ,  सोते - जगते कहो ।  धीरे धीरे सुधार फिर  तो होताहि है ॥ १ ॥  जो भूलसे पैर पडता अगन में ।  जलता ही है ,  काम करता है छिन में |  वैसे हि प्रभुका भजन है ॥  नाम तारे नहीं , यह क्या होगा कहीं ?  दास तुकड्या तो गाता  बजाता हि है ॥ २ ॥ 

मेरी अर्जी है चरणों में

 ( तर्ज - मैं एक छोटासा बच्चा हूँ . )  मेरी अर्जी है चरणों में -  दुष्ट काम का भान ,  कभी ना दे भगवान ! ॥ टेक ||  जहाँ जहाँ जाऊँ ' सब मेरे ' ,  ऐसा प्रेम मुझे दे ।  लंद फंद और झूठे झगडे ,  इनमें मत बहने दे ।।  सीधा सादा ही , दिन काटूं ,  निंदा किसिकी कान  कभी ना दे भगवान ! ॥ १ ॥  हिन्दू हो , इस्लाम , यहूदी ,  बुद्ध पारसी कोई ।  सबही नारायन रुप देखूं ,  सुख पाऊँ मन माँही ॥  ऐसी मानवता हृदय बसे ,  अन्य कोई भी ध्यान  कभी ना दे भगवान ! ॥ २ ॥  गरिब अमिर या ऊँच - नीच का ,  भेद न मनमें आवे ।  दुनिया भर के सन्त कोई हो ,  मन उनके गुण गावे ॥  पूजा यह मेरी - जन - कल्याण ,  दूजा कोई ना तूफान  कभी ना दे भगवान ! ॥ ३ ॥ मुक्त ना खाऊँ बिना परिश्रम जहाँ कही मै जाऊँ तुकड्यादास कहे खंजडी ले दिनभर बजन सुनाऊ ऐसा जीवन हो अन्त सधे कोई दुसरा दान कभी ना दे भगवान || ४ ||

किसे छिपा है । नाम तेरा

 ( तर्ज - भक्तन के संग ० )  किसे छिपा है । नाम तेरा |  भक्तनके संग काम करा || टेक || दिखने को तो पंढरपुर में ,  पर दृष्टी तेरी घर घरमें ॥  छिपा न तुझसे कुछभी भगवन ।  दिल कैसे है भला बुरा ॥  किसे ० ॥ १ ॥  दुनिया चाहे बाहर देखे ,  तू तो सबके दिलको परखे ॥   जिनकी श्रद्धा - भक्ती सही है ,  उनके हाकपे जात परा ।  किसे ० ॥ २ ॥  जिसने सत की नीयत राखी ।  उन भक्तों की रख ली साकी ||  तुकड्यादास कहे क्या गावे ,  पत्थर को भी दिया तरा |  किसे ० ।। ३ ।।

गुरु का छोटासा तीरथ है

 ( तर्ज न एक छोटासा बच्चा हूं ० )  गुरु का छोटासा तीरथ है ,  यहाँ रम गये भगवान ,  दिखा ' गुरुकुंज ' मुझे ॥ टेक ० ॥  बड़े बड़े तीरथ को छोड़ा ,  पुरी , अयोध्या , काशी ।  झाड - झूड और गर्द लता में ,  बैठ गये अविनाशी ।  सुनते भजन यहाँ खंजरि का ,  नाचे गाये गान || दिखा ० ॥ १ ॥  सुन्दर शोभा यहाँ खिली सी ,  जिधर उधर लगती है ।  जागृत है सत संग यहाँ का ,  मिलती ऊर्ध्व गती है ।  होता ध्यान यहाँ , चिन्तन का ,  सधे समाधी स्थान ॥ दिखा ० ॥ २ ॥ व्यसनीयोंका जीवन बदला ,  महापाप से छूटे |  कहता तुकडचा वही तर गये ,  जो गुरुपदको लूटे |  सारे सन्तन का आदर है ,  मानवता का धाम || दिखा ० ॥ ३ ॥ 

कैसे जाऊँ पानी भरने

 ( तर्ज - जिंदगी सुधार बंदे ० )  कैसे जाऊँ पानी भरने ?  कूप ताल - बंद है || टेक || भूक प्यास लागी तनमें ,  कैसे सुनावें इस जनमें ?   कौन मिटा देगा ? मनमें ,  किसका धरुँ छंद है ? || १ || अब तो धीर जाने आया ,  प्राणभी सताने आया । मोह लेत ममता माया ,  कब मिले वह नंद है ? || २ || किसकि कुंजी लाऊँ जाके ?  कौन मिलेंगे वहाँके ?  जो कि पानी देवे बाँके ,  टूट जाय फंद है || ३ || बिना सद्गरूके कोई ,  ताल खोलने ना पाई ।  कहे दास तुकड्या वाकी ,  दयासे अनंद है || ४ ||

है कहाँ मुकाम तेरा

 ( तर्ज - जिंदगी सुधार वंदे ० )  है कहाँ मुकाम तेरा ?  कौन नाम धामका ?  कोइ फिरे बनके माँही ,  कोइ जोग अंग रमाई ।  कोइ देखे ध्यानमाँही ,  लौ लगाय रामका || १ || कोइ कहे ‘ सबके अंदर '  कोइ कहे देखो मंदर ।  संत कहे ' तुमही ईश्वर ,  रूप तेरो श्यामका ' ॥  कोइ धुनी साध देखे ,  कोइ प्राणायम भाखे ।  कोइ धूम्रपान करके ,  लौ लगात नामका ॥  माने तो किसीका माने ?  जाने तो कहाँपे जाने ? ।  कहे दास तुकड्या हमने ,  प्रेम किया प्रेमका ॥ 

खासका पछाना करना

 ( तर्ज - जिंदगी सुधार बंदे ० )  खासका पछाना करना ,  मानुजका काम है ॥टेक ॥  जीव - शीव भेद क्या है ?  माया मोहनी यह क्या है ?  मैं - मेरा पताभी क्या है ?  जानना ये नाम है ॥ १ ॥  साधुसंत - संग साधो ,  गठडियाँ कृपाकी बाँधो ।  चलो राह वैसी जगमें ,  पाओ जभी धाम है ॥ २ ॥  श्रवणमें सोहँकी धारा ,  नैनमें निजका उजारा  कहे दास तुकड्या वाके ,  जन्मको अराम है  || ३ ||

क्यों चौरासी मों लटके

 ( तर्ज - अलमस्त पिलाया प्याला ० )  क्यों चौरासी मों लटके ?  मत भोगो आगे झटके हैं ॥ टेक ॥  अकुबत पाना चाहते हो तो ,  कुफर छोड दो हटके ।  कभी न छलबल करो किसीका ,  भजलो रामको डटके हैं ॥ १ ॥  सच्चा मारग धरो मुसाफिर !  क्यों विषयोंमें चटके ?  नेक करो नेकीसे पाओ ,  अमरपुरीके चुटके हैं ॥२ ॥  खोजो खालिक कहाँ समाया ,  राह चलो पट - पटके ।  कायर - बाना छोड़ो अपना ,  नहि तो पावे फटके हैं ॥३ ॥  कहता तुकड्या हरी भजन बिन ,  मिले न पद हरि - मठके ।  सोच सोचकर चलो जगतमें ,  पिओ शांतिके गुटके हैं ॥ ४ ॥ 

दिलखुशी फकीरी पाई

 ( तर्ज - अलमस्त पिलाया प्याला ० )  दिलखुशी फकीरी पाई ।  अब नही फिकर है भाई जी ! ॥टेक ॥  हटाके दुनिया लगा बभूती ,  रँगे गुरू - पदमाँही ।  सत्‌संगतकी नशा चढाकर ,  निर्भयपदको पाई जी ॥१ ॥ महल - अटारी क्या जाने अब ?  रही न धनकी हाई ।  मिले जहाँपर रूखी सूखी ,  गरज भली करवाई जी ॥ २ ॥  काम क्रोधको मार - मारकर ,  काबू अमल कराई ।  कफरकुफरको लगाके डंड़े ,  दिल भरवाया साँई जी ॥ ३ ॥  प्रेम - भक्तिकी चढाई कफनी ,  दयाकि माल धराई ।  तुकड्यादास कहे अब मनमें ,  जनम - मरण कुछ नाहीजी ॥४ ॥ 

लख रूप दिवाने ! घटमें

 ( तर्ज - अलमस्त पिलाया प्याला ० )  लख रूप दिवाने ! घटमें !  चल आँख उठा चट - चटमें रे ॥टेक ॥  चाँद- सुरजविन जलती ज्योती ,  देख जरा तन - मठमें ।  रंग रूपविन गिरे उजारा ,  चेतन है घट - घटमें रे ॥१ ॥  अटल रूप जल - थलमें व्याप्यो ,  जरा न रीतो उनमें ।  ग्यान दृष्टीसे जो कोड़ जाने ,  समा जात पट - पटमें रे ॥२ ॥  सत्संगत बिन मिले न मारग ,  भले घुमो कोइ बनमें ।  तुकड्यादास कहे जागो जी !  मरो न जग - खटखटमें रे ॥३ ॥ 

अजि तोडो मनका खटका

 ( तर्ज - अलमस्त पिलाया प्याला ० )  अजि तोडो मनका खटका ।  जोरोंसे दे दो झटका जी ॥टेक ॥  क्या कहना इस मनकी बातें ,  बडो बडोंको पटका ।  राव - रंकको जरा न छोड़ा  चौऱ्यासीमें गटका जी ॥१ ॥  जपी - तपी संन्यासी - साधू ,  मायामें ले अटका ।  किसे न छोड़ा बाकी इसने ,  दिया विषयका चटकाजी ॥२ ॥  ना समझे कोई मुर्शद - मौला ,  पीर - पैगंवर भटका ।  सारे जगतमें डारी जादू ,  दिया गर्भ में लटकाजी ॥३ ॥  तुकड्यादास कहे कुछ साधे ,  सत् - संगतका गुटका ।  वेही निराले रहे हैं मनसे ,  दिया उन्हीने झटका जी ॥४ ॥ 

क्यों नाहक धोखा खाया

  ( तर्ज - अलमस्त पिलाया प्याला ० )  क्यों नाहक धोखा खाया ?  यह बुरी लगाकर माया रे ॥टेक ॥  दुर्लभ वह मानुजका चोला ,  पुनसे तुझको पाया ।  काम क्रोध शत्रुके वशमें ,  होकर खोई काया रे ॥ १ ॥  किस कारणसे आया जगमें ,  समझ जरा नहि पाया ।  पाप पाप कर बुरे तुने ये ,  सारा जनम गमाया रे ॥२ ॥  सुनले भाई ! जरा गुरुकी ,  शरण लगा ले काया ।  सत्‌ संगतमें मस्त रहाकर ,  तोड़ झुठाई छाया रे ॥३ ॥  तुकड्यादास कहे जो भजते ,  उनकी उधरी काया ।  जाग जागरे अभी मुसाफिर !  क्यों जगमें बहलाया रे ? ॥४ ॥

मत धरो करमका फंदा

 ( तर्ज- अलमस्त पिलाया प्याला ० )  मत धरो करमका फंदा ।  पुरुषार्थ बनाओ बंदा जी ॥ टेक ॥  पुरुषार्थहिसे बना करम यह ,  धरो उसीका छंदा ।  कुछ करनी , कुछ करमगती है ,  पुरब जनमका धंदा जी ॥ १ ॥  मनुज - जनम यह मिले न फिरसे ,  कर्म करोगे मंदा ।  करो ग्यान सत् - संग साधकर ,  तोड़ करमका फंदाजी ॥२ ॥  जो कुछ होय आगला पिछला ,  ना लख मनका गंदा ।  तुकड्यादास कहे जागे हो ,  करो भजन आनंदा जी ॥३ ॥ 

मस्तोंके मस्त वेही

 ( तर्ज - ईश्वरको जान बंदे ० )  मस्तोंके मस्त वेही ,  जो मस्तिमें समाई ।  बिन मस्तिके न कोई ,  उनको खबर चलाई ॥ टेक ॥  धन - जनको दूर सारा ,  तिरियाको ना अधारा ।  प्यारे में दिलको हारा ,  बूरी बला दबाई ॥ १ ॥  चलते हैं मस्तिमाँही ;  सोते - पितेभि वहँही ।  पर्वा न कुछ कहाँकी ,  जाने न दूज कोई ॥२ ॥ राजा न रेक माने ,  है नाममें दिवाने तुकड्या कहें ये बातें ,  पाई उल्ले छिपाई ॥३ ॥ 

तुम हो दयाल साँई

 ( तर्ज - ईश्वरको जान बंदे ० )  तुम हो दयाल साँई !  यह भक्तसे सुना है ।  प्रिय है तुम्हें हरी - जन ,  हर कोई आ बना है || टेक || हम हैं गरीब मनके ,  भाती है याद तेरी ।  पर क्षण न ठहरती है ,  चंचल हि ' रूँह ' बना है ॥१ ॥  करते पुकार हरदम ,  के ' आस ले हमारी ' ।  पावन है नाम तेरा ,  दम - दममें भर धुना है ॥२ ॥  भव - दुःख यह हटाओ ,  अपने चरण लगाओ ।  तुकड्याकि आखरी यह ,  करदो जो लख लिन्हा ॥३ ॥ 

सुनले सुजान भाई

 ( तर्ज - ईश्वरको जान बंदे ० )  सुनले सुजान भाई !  ईश्वर सभी जगा है । ?  काहेको ढूंढता तू? तुजमेभि वह लगा है ॥ टेक ॥  कहि टूट जात छाया ?  वैसीहि है यह माया ।  मायाभि वह बना है ,  फिर डर कहाँ लगा है ? ॥१ ॥ अग्यानसे जगतको ,  बूरी लगे यह व्याधी  बस ग्यानियोंको वह ही ,  सुखकी करे जगा है || २ || जब संतसंग पाये ,  अग्यान दूर होकर ।  तब व्याधि ना रहेगी ,  निर्मल बने सगा है ॥३ ॥  तुकड्या कहे यह जानो ,  ईश्वर न भिन्न जी से ।  विश्वास दृढ बनाओं ,  वह सत्यम रंगा है ॥ ४ ॥ 

निजरूप वह तुम्हारा

 ( तर्ज - ईश्वरको जान बंदे ० )  निजरूप वह तुम्हारा ,  इस दासको दिखादो ।  मारग हमें बतादो ,  वह बोध दिल सिखादो ॥ टेक ॥  हम भूलमें पड़े हैं ,  विषयों में जा अडे हैं ।  वह भूल दूर करके ,  अग्यानको हटादो ।। १ ।।  तुमरे बिना न अब है ,  साथी कोई हमारा ।  गुरुदेव ! हम दिनोंपर ,  पूरी मेहर फिरादो ॥ २ ॥  तुकड्याकि आस यह है ,  उस रूपको बताओ । '  मैं कौन हूँ ' खबर दो ,  निज बोध दिल लिखादो ॥३ ॥ 

मायामों सब भरा है

 ( तर्ज - ईश्वरको जान बंदे ० )  मायामों सब भरा है ,  मायाने सब करा है ।  मायाको जान जावे ,  वहि संत भी तरा है ॥ टेक ॥  मायाका यह बगीचा ,  तरु - फूल - फलभि सोहे ।  दिखता है जो नजरसे ,  उसमें सभी भरा है ।। १ ।।  कइँ साधुको बनाया ,  कइँ भोंदुको जमाया ।  पुन - पापभी लगाया ,  अरु न्याय भी धरा है ॥२ ॥  खुदही नटी है माया ,  सत्ता प्रभूकि लेकर ।  तुकड्या कहे यह जाने ,  वहि जागता मरा है ।। ३ ।। 

बन बनके यार आया

 ( तर्ज - ईश्वरको जान बंदे ० )  बन बनके यार आया ,  मस्तीकि धुन मचाया । मलमस्त ले निशानी ,  सारा जगत् नचाया ॥टेक ॥  दमकी लगा बभूती ,  शमकी लगा लँगोटी ।  काबूमे दिल बनाकर ,  रंगत भली रँगाया ॥१ ॥  आँखे हैं लालरंगी ,  कफनी है त्याग जंगी ।  माला गले है भंगी ,  सत्संगमें कचाया ॥२॥  ले ग्यानका कमंडल ,  आसन है भूमिमंडल ।  तुकड्या कहे वह आशक ,  बिरलेने दिल समाया ॥३ ॥

नर - तन अमोल यह है

 ( तर्ज - ईश्वरको जवान बंदे ० )  नर - तन अमोल यह है ,  सुध ले जरा पियारे !  भज राम - नाम हरदम ,  तो पार होयगा रे ! || टेक || विषयोंके जालमाँही ,  क्योंकर पड़ा हुआ है ? ।  गुरुकी शरणमें जा तू ,  तनको वही उधारे ॥१ ॥  पशुओंकि योनियों में भी  भोग - रोग यह था ।  सुंदर मनूज - तनका ,  सार्थक न होयगा रे || २ ||  जंजाल मोह - माया ,  इसमें न दिल लगा तू ।  कर नेक काम जगमें ,  होंगे प्रभू तुम्हारे ॥३ ॥  तुकड्या कहे न फिरसे ,  ऐसा समय मिलेगा ।  गर जन्म खोदिया फिर ,  नापाक घर लिया रे ॥४ ॥ 

दुनियाकि लालचोंमें

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  दुनियाकि लालचोंमें ,  मत खो उमर दिवाने ! ।  कुछ पायगा न इसमें ,  सच खोज ले सयाने ! ॥ टेक ॥  ईश्वरसे लौ धरेगा ,  ईश्वर पुरा करेगा ।  दुर्जनसे प्रेम करके ,  क्या पायगा निशाने ? ।। १ ।।  जो खुद मरे मरणमें ,  वह क्या लियाज गुणमें ?  मरनाहि दे करममें ,  क्या लेयगा सयाने ! ॥२ ॥  ऐसेकि आस करना ,  जो शांति दे निभावे ' ।  तुकड्या कहे निभाना ,  सो संत एक जाने ॥३ ॥ 

मनका मत सुनना गाना

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  मनका मत सुनना गाना ।  अगर दिलदार तुझे पाना ॥टेक ॥  अर्गन बाजाको छोडा है ,  गधडे सुरको सुनता ।  दस नादोंको सुनले प्यारे !  संत जहाँ थुन रहता ।। १ ।।  राजा होकर चकिया पीसे ,  क्या तेरी चतुराई ? ।  अमृत होकर जहर उठाता ,  किसने चैन सिखाई ? ॥ २ ॥  ग्यानी होकर भूले जगमें ,  दूर किया है साँई ।  साक्षी होकर सब इंद्रियका ,  फँसता क्यों तनमाँही ? ॥ ३ ॥  कहता तुकड्या दास गुरूका ,  अपने धुनको धुनले ।  पता कराकर अपने आपका ,  दुसरोंकी ना सुनले ॥४ ॥ 

आकर मायामों भटके

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  आकर मायामों भटके ।  खुले नहि करके पट घटके || टेक || बालापन तो खेल गमाया ,  मोज किया स्टके ।  तारुणपन तिरिया - सँग लागा ,  विषय - लोभमें अटके ॥ १ ॥ यह संसार जाल बड भारी ,  सुत - मितमों अटके ।  पाप तापमें उमर गुजारी ,  काम - क्रोधके झटके ॥२ ॥  बूढेपनमें रोग सतावे ,  देह करे खटके ।  झूठी माया काहे लगाया ?  अंत आय फिर सटके ॥ ३ ॥  तुकड्यादास कहे जो आये ,  यही राह पटके ।  तू तो हो कुछ हुशार बंदे !  प्रभू - नाम ले डटके ॥४ ॥ 

झूठी मायामों भूला

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  झूठी मायामों भूला ।  आखरी खावेगा झोला ॥ टेक ॥  देह-सौख्यको साच समझकर ,  विषयनके सँग डोला ।  अंतकाल फिर पछतावेगा ,  जमघर जात अकेला ॥ १ ॥ '  मेरा मेरा ' कहते कहते ,  धन औरोंने घुला ।  यह न हुआ फिर वह न हुआ तो ,  झटके खावे खूला ॥ २ ॥  सच्चा मारग छोड दिया और ,  मृगजलमें क्यों भूला ?  मानवजन्म गमाया बंदे !  फेर मिले नहि मेला ॥ ३ ॥  कहता तुकड्या दास गुरूका ,  भजले ' हरि ' की माला ।  तर जावेगा भवसागरमें ,  धर यह पथ निराला ॥ ४ ॥ 

किसने चैन सिखाया है

 ( तर्ज - संगत सतनकी करले ० )  किसने चैन सिखाया है ?  सभी घर - माल  बिकाया है || टेक || बालापनमों सोबत लागी ,  ठाठ दिखाया है ।  खावे माल चटूरा फिरके ,  कर्ज बढ़ाया है ।। १ ।।  विषय - जालमें पैसा खोया ,  फिरके रोया है । "  बाप - बड़ोंने खेत कमाया ,  मोल बिकाया है || २ ||  आखिर होकर फकीर झोली ,  काँधे लगाया है ।  घर घर माँगे भीख ,  आखरीमें पछताया है || ३ ||  कहता तुकड्या झूठे जनके ,  सँगसे पाया है ।  अब क्या होता बखत गयेपर ?  क्यों तू सोया है ? ॥४ ॥ 

कलीने सबका मत मारा

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  कलीने सबका मत मारा ।  जुनाई शास्त्र - पंथ हारा ॥ टेक ॥  नीतिधर्मको मानत झूठा ,  एक किया सारा ।  कहाँ पाप और कहाँ पून है ?  सभी तोड़ि धारा ॥ १ ॥  अपने पिताको कहते हैं '  यह कहाँका बाप हमारा ?  विषय - वासना खूब बढी तब ,  पैदा जन्म हमारा ' ॥२ ॥  साधुसंतको कोउ न पूछे ,  लाखों साधुका तांडा ।  ब्रह्म - ग्यानकी करते बातें ,  घरमें रखते रांडा ॥ ३ ॥  श्रुति शास्त्रोंको कोउ न माने ,  कादंबरिसे यारी ।  तुकड्यादास कहे यह आई ,  ऐसी रीत नियारी ॥ ४ ॥

देखो कलजुगके ग्यानी

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  देखो कलजुगके ग्यानी ।  एकसे एक पडे प्राणी ॥ टेक ॥  अपना सबको मार्ग बताकर ,  उनकी कीन्ही हानी ।  धनदौलत सब लूट दबाई ,  यह रखते हैं बानी ॥ १ ॥  ब्रह्मग्यानकी बात सुनाकर ,  दिया जिसे बैरागा ।  उसका धन सब छीन - छीनकर ,  करता मजा लफंगा ॥२ ॥  शिष्य बनाया सब लुट खाया ,  नहि है नामनिशानी ।  आखिर उसको रोटि न देवे ,  यह ग्यानन की बानी ॥ ३ ॥  कहता तुकड्या चोरबजारा ,  उसको दुनिया मानी ।  सच्चे जनको दूर कियाकर ,  ना देवेंगे पानी ॥ ४ ॥ 

भज तू हरिको ऐसा रे

 ( तर्ज - संगत संतनकी करले ० )  भज तू हरिको ऐसा रे ।  दिवाना होय सदा प्यारे ॥ टेक ॥  षड् विकारको करले काबू ,  पंचविषय को मारे ।  चित्त स्थिरकर घटके अंदर ,  रोशन आँख उजारे ॥१ ॥  सप्त चक्रके फूलों अंदर ,  जगमग चमके तारे ।  कहिंसे ब्रह्मा , कहिंसे विष्णू ,  कहीं इंद्र प्रगटा रे ॥२ ॥  जागृत , स्वप्न , सुषुप्ती , तुर्या ,  इनकी हैं मढियाँ रे । '  आतम ' राजा रमे उसीमें ,  अनुभव पावे न्यारे ॥ ३ ॥  कहता तुकड्यादास गुरूका ,  नशा चढ़ाले उसकी ।  जभी मिलेगा दर्श हरीका ,  छोडो आशा मनकी ॥ ४ ॥